लखनऊ : विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 1947 में देश के विभाजन की त्रासदी को मानवता के इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक बताया। आज पूरा देश उस भीषण त्रासदी की स्मृतियों से जुड़ रहा है, जब करोड़ों हिंदुओं को अपनी ही मातृभूमि और जन्मभूमि से विस्थापित होना पड़ा तथा बड़ी संख्या में हिंदू, सिख, बौद्ध और जैन समाज के लोगों को हिंसा और कत्लेआम का सामना करना पड़ा। उस समय पीड़ितों की पीड़ा सुनने और उनके प्रति संवेदना व्यक्त करने वाला कोई नहीं था। सत्ता प्राप्ति की लिप्सा में एक सनातन राष्ट्र को विभाजन की ओर धकेलकर उसके टुकड़े कर दिए गए।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ शुक्रवार को लखनऊ स्थित लोकभवन में आयोजित विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस समारोह कार्यक्रम में शामिल हुए। इस दौरान सीएम ने इससे संबंधित कई पेंटिंग का भी अवलोकन किया।
मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं है। इतिहास को केवल पन्ने पलटने या परीक्षा के पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं किया जा सकता। इतिहास हमें गौरवशाली अतीत पर गर्व करने के साथ-साथ अतीत की गलतियों से सीख लेकर उन्हें दोबारा न दोहराने की प्रेरणा देता है। यह समझना जरूरी है कि विभाजन की परिस्थितियां क्यों पैदा हुईं, इसके लिए कौन जिम्मेदार था, दोषियों को कितनी सजा मिली और आखिर कब तक देश को उस त्रासदी की कीमत चुकानी पड़ेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस मनाने के पीछे भी यही भावना है कि वर्तमान और आने वाली पीढ़ी को उस दौर की सच्चाई से अवगत कराया जाए। पूरे प्रदेश के नागरिकों को चाहिए कि वे अपने वर्तमान और आने वाली पीढ़ी को बताएं कि विभाजन की त्रासदी क्या थी और उससे हमें क्या सीख मिलती है।
सीएम योगी ने कहा कि 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिली, लेकिन इसके साथ ही देश का विभाजन भी हुआ। पंजाब और बंगाल के उन हिस्सों को भी पाकिस्तान को सौंप दिया गया, जहां बड़ी संख्या में ऐसे लोग रहते थे जो विभाजन के परिणामस्वरूप प्रभावित हुए। विभाजन के दौरान लाखों लोग अपने घर-बार छोड़कर शरणार्थी बनने को मजबूर हुए। उस समय हुए नरसंहार और विस्थापन की पीड़ा को आज की पीढ़ी के सामने लाना जरूरी है। प्रदर्शनी में प्रदर्शित तस्वीरों और वीडियो का उल्लेख करते हुए कहा कि इनमें उस समय की भयावह परिस्थितियों की झलक मिलती है। इसलिए लोगों को यह देखना चाहिए कि किस तरह परिवार अपने घरों से निकलने को मजबूर हुए और किस तरह लोगों ने अपने जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी झेली।
विभाजन की कीमत निर्दोष नागरिकों ने चुकाई
सीएम ने कहा कि पंजाब में अकेले लाखों लोगों की जान गई। विभाजन के दौरान ट्रेनों में हिंसा की घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसी घटनाएं आज भी उस त्रासदी की भयावहता को सामने लाती हैं। यह इतिहास मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि समाज और आने वाली पीढ़ी को सबक देने के लिए है। विभाजन की कीमत निर्दोष नागरिकों ने चुकाई और उसका प्रभाव लंबे समय तक देश को झेलना पड़ा। आतंकवाद, नक्सलवाद और उग्रवाद जैसी चुनौतियों को भी अतीत की परिस्थितियों और देश के भीतर पैदा हुए विभाजनकारी तत्वों के संदर्भ में समझने की जरूरत है। भारत के पास कभी शक्ति, बुद्धि और वैभव की कमी नहीं रही। लगभग 16वीं-17वीं शताब्दी का उदाहरण देते हुए कहा कि उस दौर में विश्व अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी करीब 24-25 प्रतिशत तक बताई जाती है। भारत वैभवशाली और संपन्न था, इसलिए विदेशी आक्रांताओं की नजर भारत पर थी। मुख्यमंत्री ने कहा कि जब देश में न शक्ति की कमी थी, न बुद्धि की और न ही वैभव की, तब सवाल उठता है कि देश गुलाम क्यों हुआ।
भारत को कमजोर करने में आंतरिक विभाजन ने बड़ी भूमिका निभाई
सीएम योगी ने इसका कारण आपसी अंतर्विरोधों को बताते हुए कहा कि क्षेत्र, भाषा और दूसरे आधारों पर समाज में पैदा हुए विभाजन के साथ षड्यंत्रकारी ताकतों को अवसर मिला। जब किसी समाज को यह लगता है कि हमला किसी दूसरे वर्ग, क्षेत्र या समुदाय पर हो रहा है तो वह अपने स्तर पर प्रतिरोध नहीं करता। यही कमजोरी देश के लिए नुकसानदायक साबित हुई। भारत को कमजोर करने में आंतरिक विभाजन ने बड़ी भूमिका निभाई। सनातन काल से एक भारत के रूप में मौजूद देश समय के साथ अलग-अलग हिस्सों में बंटता गया। स्वतंत्रता संग्राम के अनेक सेनानियों का जिक्र करते हुए कहा कि महात्मा गांधी, सरदार वल्लभभाई पटेल, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, राजगुरु, राम प्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह, चंद्रशेखर आजाद, रानी लक्ष्मीबाई और वीर सावरकर समेत अनेक महापुरुषों ने देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया। जिन क्रांतिकारियों ने देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया, उनके योगदान को याद रखना जरूरी है।
नागरिकता कानून को लेकर भ्रम फैलाया गया, यूपी में उपद्रव की कोशिशें हुईं
मुख्यमंत्री ने नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) का जिक्र करते हुए कहा कि इस कानून के प्रावधानों को लेकर विपक्ष द्वारा देश में भ्रम फैलाया गया। कानून में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न के कारण भारत आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को नागरिकता देने का प्रावधान है। इसमें किसी की जमीन या संपत्ति छीनने का कोई प्रावधान नहीं था। इसके बावजूद कानून के विरोध में देश के कई हिस्सों में आंदोलन और हिंसा की कोशिशें हुईं। मुख्यमंत्री ने उत्तर प्रदेश के लखनऊ, कानपुर, मेरठ, संभल, अलीगढ़, बुलंदशहर, मुजफ्फरनगर और सहारनपुर समेत कई स्थानों का उल्लेख किया। प्रदेश में कानून-व्यवस्था मजबूत होने के कारण स्थिति को नियंत्रण से बाहर नहीं जाने दिया गया।
नागरिकता कानून के विरोध के पीछे राजनीतिक स्वार्थ
मुख्यमंत्री ने कांग्रेस व सपा पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि नागरिकता कानून के विरोध के पीछे राजनीतिक स्वार्थ और वोट बैंक की राजनीति काम कर रही थी। यदि किसी विस्थापित हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन या पारसी को भारत सरकार नागरिकता देकर बसाना चाहती है तो किसी को इससे परेशानी क्यों होनी चाहिए। बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हुई हिंसा का जिक्र करते हुए कहा कि वहां हुई घटनाओं पर भी राजनीतिक दलों को अपनी प्रतिक्रिया देनी चाहिए थी। सीएम ने आरोप लगाया कि कुछ दल वोट बैंक की राजनीति के कारण ऐसे मामलों पर बोलने से बचते हैं। विभाजन के बाद विस्थापित परिवारों के पुनर्वास का मुद्दा उठाते हुए कहा कि विभाजन की त्रासदी के दशकों बाद भी कई परिवार नागरिकता और स्थायी पहचान के लिए संघर्ष करते रहे। उत्तर प्रदेश में ऐसे परिवारों के दस्तावेज दुरुस्त कराने और जमीन के कागजात उपलब्ध कराने की दिशा में काम किए।
बांग्लादेश से आए परिवारों को जमीन से जुड़े कागजात उपलब्ध कराए गए
सीएम ने कहा कि पीलीभीत में बांग्लादेश से आए हजारों परिवारों के दस्तावेज दुरुस्त कर उन्हें जमीन से जुड़े कागजात उपलब्ध कराए गए। लखीमपुर खीरी में भी बांग्लादेश से आए पीड़ित हिंदू परिवारों को नागरिकता उपलब्ध कराई गई। करीब 16 हजार के आसपास लोगों को नागरिकता प्रदान की गई। वहीं रामपुर में पाकिस्तान से आए लोगों के दस्तावेज दुरुस्त करने और नागरिकता की प्रक्रिया चलने की बात भी कही। सीएम ने कहा कि विभाजन के समय विस्थापित लोगों के पुनर्वास और उनकी संपत्ति के नुकसान की भरपाई के लिए गंभीर प्रयास होने चाहिए थे लेकिन पिछली सरकारों ने इस दिशा में पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।
सीएम योगी ने दिया संदेश- देश नहीं झुकने देंगे
विभाजन की विभीषिका स्मृति दिवस पर राजधानी लखनऊ में सीएम योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में मौन यात्रा निकाली गई। सबसे पहले सीएम योगी ने हजरतगंज स्थित सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की। मौन यात्रा के जरिए देश की एकता का संदेश दिया गया। करीब आधे किमी की यात्रा के दौरान सीएम योगी के हाथ में ‘देश नहीं झुकने देंगे, फिर देश नहीं बंटने देंगे’ लिखा पोस्टर भी नजर आया। उनके साथ लखनऊ की महापौर सुषमा खर्कवाल समेत अन्य वरिष्ठ नेता भी कदमताल करते हुए लोकभवन तक पहुंचे। इस दौरान उनके हाथ में ‘राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता सर्वोपरि’, ‘विभाजन के कारण पलायन करने को मजबूर हुए लाखों लोग ट्रेनों से वापस आते समय सांप्रदायिक दंगों की भेंट चढ़ गए’ जैसे तमाम पोस्टर चर्चा का विषय बने।
विभाजन पीड़ितों को जमीन देने के बजाय शत्रु संपत्ति का बंदरबांट करती रही कांग्रेस
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विभाजन की त्रासदी को लेकर कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि उस समय कांग्रेस का दायित्व था कि सबसे पहले विस्थापितों को नागरिकता प्रदान कर जमीन के पट्टे उपलब्ध करवाती। जितनी उनकी प्रॉपर्टी वहां नष्ट या जब्त की गई थी, उतनी यहां उपलब्ध करवानी चाहिए थी। इसके बजाय कांग्रेस शत्रु संपत्ति की रक्षा और उसमें बंदरबांट करने में मशगूल रही। ये लोग उसी संपत्ति को लूट-खसोट का आधार बनाकर अपनी निजी प्रॉपर्टी बना रहे थे। सीएम योगी ने कहा कि यह संपत्ति पाकिस्तान से आने वाले हिंदू, सिख, बौद्ध और जैन लोगों में बांटी जानी चाहिए थी। महमूदाबाद के नवाब की पूरी प्रॉपर्टी को बचाने के लिए कांग्रेसियों ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। मुख्यमंत्री ने समाजवादी पार्टी पर भी निशाना साधते हुए कहा कि वह ऐसे लोगों की पैरोकार बन रही है, जिन पर देश की आजादी के खिलाफ और विभाजन कराने में भूमिका होने के आरोप हैं।
इस दौरान डिप्टी सीएम बृजेश पाठक, मंत्री डॉ. अरुण कुमार, लखनऊ की महापौर सुषमा खर्कवाल, सांसद बृजलाल, पूर्व मंत्री और विधान परिषद सदस्य डॉ. महेंद्र सिंह, विधायक जयदेवी, विधायक डॉ. नीरज बोरा समेत अनेक नेता और विस्थापित परिवारों के प्रतिनिधि मौजूद रहे।


