- गाड़ी अपनी नहीं तो पहचान कैसे होगी? बदमाशों ने अपनाया सेल्फ ड्राइविंग का रास्ता
कविता रोहतक : वारदात की प्लानिंग बदली तो बदमाशों और नशा तस्करों ने सफर का तरीका भी बदल लिया। पुलिस की नजर से बचने के लिए अब अपनी गाड़ी लेकर निकलने के बजाय किराये की सेल्फ ड्राइविंग गाड़ियों का इस्तेमाल किया जा रहा है। पिछले दिनों गुरुग्राम में हुए एनकाउंटर के मामले में भी बदमाशों के सेल्फ ड्राइविंग के लिए किराये पर गाड़ी लेने की बात सामने आई थी। सांपला में गांजा तस्करी के मामले में पकड़े गए आरोपियों ने भी इसी तरीके का इस्तेमाल किया। आरोपी ओडिशा से गांजा लेकर हरियाणा पहुंचे थे और इसके लिए उन्होंने किराये की सेल्फ ड्राइविंग गाड़ी का इस्तेमाल किया।
पुलिस के लिए यह तरीका इसलिए भी चुनौती बन रहा है, क्योंकि किराये की गाड़ी वारदात से सीधे तौर पर आरोपियों के नाम से जुड़ी नहीं होती। बदमाश वाहन बदलकर पुलिस की शुरुआती जांच को उलझाने की कोशिश करते हैं। हालांकि, वाहन किराये पर लेने के दौरान दिए गए दस्तावेज, मोबाइल लोकेशन, सीसीटीवी फुटेज, टोल रिकॉर्ड और जीपीएस जैसे डिजिटल सुराग जांच में महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकते हैं।
अपनी गाड़ी छोड़ किराये की कार क्यों?
बदमाशों और तस्करों के लिए अपनी गाड़ी इस्तेमाल करने का सबसे बड़ा जोखिम यह होता है कि वाहन का रजिस्ट्रेशन सीधे उनके या उनके किसी साथी के नाम से जुड़ा हो सकता है। ऐसे में पुलिस को वारदात के बाद वाहन की पहचान करने और आरोपियों तक पहुंचने में अपेक्षाकृत आसानी हो सकती है। सेल्फ ड्राइविंग गाड़ी इस कड़ी को कमजोर करने का प्रयास होती है। आरोपी तय अवधि के लिए वाहन लेते हैं और वारदात के बाद उसे वापस कर देते हैं।
ओडिशा से रोहतक तक किराये की गाड़ी में गांजा
सांपला में पकड़े गए तस्करों के मामले ने इस बदलते तरीके की तस्वीर सामने रखी है। आरोपी ओडिशा से गांजा लेकर हरियाणा पहुंचे थे। जिस वाहन से गांजा लाया गया, वह उनकी निजी गाड़ी नहीं थी, बल्कि सेल्फ ड्राइविंग के लिए किराये पर ली गई थी। इससे जांच एजेंसियों के सामने अब केवल मादक पदार्थ की बरामदगी ही नहीं, बल्कि वाहन किसने, कब और किन दस्तावेजों पर किराये पर लिया, इसकी कड़ी जोड़ना भी अहम हो गया है।
गुरुग्राम एनकाउंटर में भी सामने आया था तरीका
पिछले दिनों गुरुग्राम में सामने आए एनकाउंटर के मामले में भी बदमाशों द्वारा सेल्फ ड्राइविंग के लिए किराये पर गाड़ी लेने की बात सामने आई थी। दो अलग-अलग मामलों में इस तरह की समानता पुलिस के लिए एक संकेत है कि अपराधी वारदात में इस्तेमाल होने वाले वाहनों को अपनी पहचान से दूर रखने की कोशिश कर रहे हैं। इससे जांच में वाहन मालिक और वाहन इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति के बीच की कड़ी महत्वपूर्ण हो जाती है।
पुलिस के लिए चुनौती, लेकिन सुराग भी कम नहीं
किराये की गाड़ी इस्तेमाल करने से बदमाशों को भले ही शुरुआती स्तर पर फायदा मिलने की उम्मीद रहती हो, लेकिन इससे वे पूरी तरह जांच से बच नहीं सकते। गाड़ी बुक कराने के दौरान जमा किए गए पहचान पत्र, ड्राइविंग लाइसेंस और अन्य दस्तावेज, भुगतान का तरीका, मोबाइल नंबर, सीसीटीवी फुटेज, टोल प्लाजा रिकॉर्ड और वाहन की जीपीएस हिस्ट्री जांच का हिस्सा बन सकती है। पुलिस इन कड़ियों को जोड़कर यह पता लगा सकती है कि गाड़ी किसने ली और उसका इस्तेमाल कहां-कहां हुआ।
सेल्फ ड्राइविंग का बढ़ता इस्तेमाल बना चिंता
अपराध में सेल्फ ड्राइविंग वाहनों का इस्तेमाल पुलिस के लिए एक उभरती चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। खासकर नशा तस्करी और संगठित अपराध में आरोपी ऐसे वाहनों को इसलिए पसंद कर सकते हैं क्योंकि वाहन उनके नाम पर नहीं होता और वारदात के बाद उसे वापस किया जा सकता है। दूसरी ओर, किराये की गाड़ियों का रिकॉर्ड भी जांच एजेंसियों को डिजिटल और दस्तावेजी सुराग देता है। ऐसे में आने वाले समय में सेल्फ ड्राइविंग वाहन उपलब्ध कराने वाली कंपनियों और पुलिस के बीच रिकॉर्ड सत्यापन और संदिग्ध बुकिंग की निगरानी भी अहम हो सकती है।

