कविता.रोहतक : शहर में ट्रैफिक व्यवस्था को पटरी पर लाने और चौराहों पर जाम से निजात दिलाने के लिए लाखों रुपये खर्च कर ट्रैफिक लाइटें लगाई गईं, लेकिन इन लाइटों की हालत देखकर लगता है कि सिस्टम को चलाने से ज्यादा मुश्किल उसे चालू रखना है। शहर के कई प्रमुख चौराहों पर ट्रैफिक सिग्नल कब बंद हो जाएं, इसका कोई भरोसा नहीं।
सिग्नल बंद होते ही चौराहों पर व्यवस्था की जगह वाहन चालकों की मनमर्जी शुरू हो जाती है और देखते ही देखते जाम की स्थिति बन जाती है। जाट भवन के पास का चौक इसका उदाहरण है। यहां ट्रैफिक लाइट बंद होने पर चारों दिशाओं से आने वाले वाहन एक-दूसरे के रास्ते में आ जाते हैं। न कोई तय प्राथमिकता रहती है, न ट्रैफिक को नियंत्रित करने वाला भरोसेमंद सिग्नल। ऐसे में कुछ मिनट की खराबी कई बार लंबी कतार में बदल जाती है।
लाइट बंद, फिर ‘जिसकी गाड़ी उसकी बारी’
ट्रैफिक सिग्नल का मकसद ही यही है कि चौराहे पर वाहन चालकों को पता रहे कि कब रुकना है और कब आगे बढ़ना है। लेकिन जब सिग्नल ही बंद हो जाए तो नियम पीछे और जल्दबाजी आगे आ जाती है। एक दिशा से वाहन निकलने लगते हैं तो दूसरी तरफ से आने वाले चालक भी रास्ता तलाशते हैं। नतीजा, कटाकटी, हॉर्न, रेंगता ट्रैफिक और जाम। व्यस्त चौराहों पर यह स्थिति और ज्यादा खतरनाक हो जाती है।
दिल्ली बाईपास पर ‘डबल मुसीबत’
दिल्ली बाईपास की स्थिति इससे भी ज्यादा परेशान करने वाली है। यहां पहले ही प्राइवेट वाहन चालकों द्वारा अवैध रूप से बस स्टैंड जैसा स्थान बना लेने से ट्रैफिक पर दबाव रहता है। सवारी उठाने और उतारने के लिए वाहन सड़क किनारे या आसपास रुकते हैं, जिससे गुजरते वाहनों की गति प्रभावित होती है। इसके ऊपर अगर ट्रैफिक लाइट भी बंद हो जाए तो स्थिति और बिगड़ जाती है। एक तरफ अनधिकृत रूप से खड़े वाहन, दूसरी तरफ सिग्नल व्यवस्था ठप—ऐसे में वाहन चालकों के सामने चौराहा पार करना चुनौती बन जाता है।
मेंटेनेंस और मॉनिटरिंग हो
ट्रैफिक लाइट तकनीकी कारण से बंद हो सकती है, लेकिन असली सवाल मेंटेनेंस और मॉनिटरिंग का है। अगर किसी प्रमुख चौराहे की लाइट बंद है तो इसकी जानकारी संबंधित विभाग को तुरंत होनी चाहिए और उसे जल्द ठीक कराया जाना चाहिए। चौराहों पर सिग्नल सिर्फ लाल-पीली-हरी बत्तियां नहीं हैं। ये सड़क पर अनुशासन बनाए रखने का सिस्टम हैं। इनके बंद होने का सीधा असर ट्रैफिक की गति, जाम और सड़क सुरक्षा पर पड़ता है।
आखिर कब सिस्टम ठीक होगा
शहर में ट्रैफिक सुधारने के लिए सिर्फ सिग्नल लगा देना काफी नहीं है। सिग्नल चालू रहें, समय पर उनकी मरम्मत हो और जहां वाहन अवैध रूप से खड़े होकर ट्रैफिक रोक रहे हैं, वहां कार्रवाई भी हो, तभी व्यवस्था सुधरेगी। वरना सड़क पर लाखों रुपये की ट्रैफिक लाइटें लगी रहेंगी, लेकिन लाइट बुझते ही पूरा ट्रैफिक सिस्टम भी बुझ जाएगा। प्रशासन को जाट भवन चौक समेत शहर के सभी प्रमुख चौराहों की ट्रैफिक लाइटों की नियमित जांच, तत्काल मरम्मत और दिल्ली बाईपास पर बने अवैध बस स्टैंड के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। क्योंकि जाम सिर्फ समय नहीं खाता, कई बार एक छोटी-सी अव्यवस्था बड़े हादसे का कारण भी बन सकती है।


