Supreme Court: भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि घरेलू कामकाज करने वाली महिलाओं को केवल “हाउसवाइफ” नहीं बल्कि “होममेकर” और “नेशन बिल्डर” के रूप में देखा जाना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सड़क दुर्घटना जैसे मामलों में यदि किसी महिला की मृत्यु हो जाती है या वह काम करने में असमर्थ हो जाती है, तो उसके द्वारा किए जाने वाले घरेलू कार्यों के नुकसान को भी मुआवजे का आधार माना जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने गृहिणी की घरेलू सेवाओं का मूल्य कम से कम ₹30,000 प्रति माह तय किया है। यह राशि अन्य मुआवजों से अलग और अतिरिक्त होगी।
मामला और फैसला
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन.के. सिंह की बेंच ने यह फैसला उस मामले में दिया, जिसमें एक व्यक्ति ने सड़क दुर्घटना में अपनी पत्नी को खो दिया था। महिला के तीन बच्चे थे। पहले मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल ने मात्र ₹2 लाख का मुआवजा दिया था। बाद में हाई कोर्ट ने इसे बढ़ाकर ₹8.43 लाख किया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने महिला के घरेलू योगदान को ध्यान में रखते हुए कुल मुआवजा ₹62.77 लाख तय किया।
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घरेलू योगदान का महत्व
कोर्ट ने कहा कि खाना बनाना, सफाई करना, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल जैसे कार्य परिवार की नींव हैं। इन कार्यों की वजह से परिवार के अन्य सदस्य अपनी नौकरी और व्यवसाय पर ध्यान दे पाते हैं। इसके बावजूद इन कार्यों को आर्थिक गतिविधि के रूप में मान्यता नहीं मिलती।
आंकड़े और वास्तविकता
टाइम यूज सर्वे-2019 का हवाला देते हुए कोर्ट ने बताया कि 15-59 वर्ष की महिलाएं प्रतिदिन औसतन 7 घंटे से अधिक घरेलू काम करती हैं, जबकि पुरुष तीन घंटे से भी कम समय देते हैं। महिलाओं का यह अवैतनिक श्रम भारत की अर्थव्यवस्था में 15-17% तक योगदान करता है। इसके बावजूद उन्हें उचित आर्थिक मान्यता और सामाजिक सम्मान नहीं मिलता।

