डी-पार्क की आग चेतावनी है, नहीं चेते तो अतिक्रमण एक दिन पूरे रोहतक को जला देगा
सड़कों पर कब्जे, बाजारों में खतरा दमकल फंसी तो कौन बचाएगा
10 दुकानें राख, 3 जिंदगियां खत्म, अब भी नहीं जागे तो देर हो जाएगी
रोहतक: डी-पार्क क्षेत्र में शनिवार को लगी भीषण आग ने शहर को झकझोर कर रख दिया। देखते ही देखते 10 दुकानें आग की चपेट में आ गईं और तीन लोगों की दर्दनाक मौत हो गई। हादसे के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि ऐसी घटना शहर के उन बाजारों में हो जाए, जहां अतिक्रमण ने सड़कों को निगल लिया है, तो क्या हालात संभाले जा सकेंगे? रेलवे रोड, किला रोड, माल गोदाम रोड, प्रताप चौक, गोहाना अड्डा और पुराने बाजारों की तंग गलियां आज भी अतिक्रमण की गिरफ्त में हैं। दुकानों के बाहर तक फैला सामान, रेहड़ियां और सड़क पर कब्जे न केवल जाम का कारण बन रहे हैं, बल्कि किसी भी बड़े अग्निकांड की स्थिति में इन्हें बारूद का ढेर बना सकते हैं।
आग से ज्यादा खतरनाक हैं बंद रास्ते
डी-पार्क हादसे में दमकल विभाग ने कड़ी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया, लेकिन शहर के कई बाजार ऐसे हैं जहां फायर ब्रिगेड की बड़ी गाड़ी का प्रवेश तक मुश्किल है। कई जगह सड़कें इतनी सिकुड़ चुकी हैं कि दो वाहन आमने-सामने आ जाएं तो जाम लग जाता है। आग से लड़ने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका शुरुआती कुछ मिनटों की होती है। यदि दमकल वाहन समय पर मौके तक नहीं पहुंच पाए तो छोटी चिंगारी भी दर्जनों दुकानों और कई जिंदगियों को निगल सकती है।
बाजार नहीं, बारूद के ढेर बनते जा रहे हैं व्यावसायिक क्षेत्र
शहर के पुराने बाजारों में कपड़ा, प्लास्टिक, पैकिंग सामग्री, फर्नीचर, केमिकल और इलेक्ट्रॉनिक सामान बड़ी संख्या में रखा जाता है। इन दुकानों के बाहर भी माल सजा रहता है। ऐसे में आग लगने पर यह सामान ईंधन का काम करता है। अतिक्रमण के कारण यदि दमकल गाड़ियों को रास्ता न मिले तो आग कुछ मिनटों में पूरी मार्केट को अपनी चपेट में ले सकती है। डी-पार्क की घटना ने यह खतरा साफ तौर पर सामने ला दिया है।
जाम में फंस सकती है एंबुलेंस
अतिक्रमण सिर्फ आग बुझाने में ही बाधा नहीं है। किसी भी हादसे के दौरान एंबुलेंस को मरीज तक पहुंचने और अस्पताल ले जाने में भी परेशानी होती है। किला रोड, रेलवे रोड और गोहाना अड्डा जैसे क्षेत्रों में अक्सर जाम की स्थिति बनी रहती है। यदि किसी अग्निकांड या भवन हादसे में लोग घायल होते हैं तो हर मिनट कीमती होता है। लेकिन अतिक्रमण के कारण यह कीमती समय जाम में बर्बाद हो सकता है, जो मौतों की संख्या बढ़ाने का कारण बन सकता है।
हादसे के बाद भी लौट आता है कब्जों का साम्राज्य
नगर निगम समय-समय पर अतिक्रमण हटाने के अभियान चलाता है। कुछ दिनों तक सड़कें खुली नजर आती हैं, लेकिन जल्द ही फिर दुकानों के बाहर सामान सजने लगता है और रेहड़ियां सड़क पर लौट आती हैं। यही वजह है कि शहर में अतिक्रमण अब अस्थायी समस्या नहीं बल्कि स्थायी खतरा बन चुका है। कार्रवाई होती है, लेकिन उसका असर ज्यादा दिन नहीं टिकता।
व्यापार भी हो रहा प्रभावित
व्यापारी भी मानते हैं कि अव्यवस्थित बाजार लंबे समय में कारोबार को नुकसान पहुंचाते हैं। ग्राहक जाम और भीड़ से परेशान होकर ऑनलाइन खरीदारी या दूसरे विकल्प चुनने लगे हैं। यदि बाजार व्यवस्थित हों, पार्किंग की सुविधा हो और सड़कें खुली रहें तो ग्राहकों की संख्या बढ़ सकती है। लेकिन मौजूदा हालात में अतिक्रमण व्यापार के लिए भी नुकसानदायक साबित हो रहा है।
सफाई, सुरक्षा और निगरानी भी हो रही प्रभावित
अतिक्रमण के कारण सफाई कर्मियों को काम करने में परेशानी होती है। कई स्थानों पर कचरा जमा रहता है और जल निकासी व्यवस्था प्रभावित होती है। इसके अलावा सीसीटीवी निगरानी और पुलिस गश्त पर भी असर पड़ता है। आपदा की स्थिति में बचाव दलों को रास्ता नहीं मिलने का खतरा अलग बना रहता है। यही कारण है कि विशेषज्ञ अतिक्रमण को केवल ट्रैफिक समस्या नहीं बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा का बड़ा खतरा मानते हैं।
डी-पार्क की आग को चेतावनी समझने की जरूरत
शनिवार का अग्निकांड सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि शहर के लिए चेतावनी है। तीन लोगों की मौत और 10 दुकानों का जलना यह बताने के लिए काफी है कि आग किसी को मौका नहीं देती। यदि बाजारों में अतिक्रमण नहीं रुका और सड़कें इसी तरह सिकुड़ती रहीं, तो अगला हादसा और भी भयावह हो सकता है। सवाल सिर्फ जाम का नहीं है, सवाल शहर की सुरक्षा का है। अब प्रशासन, व्यापारियों और आम लोगों को मिलकर फैसला करना होगा कि बाजारों को बचाना है या अतिक्रमण को बढ़ने देना है।

