कविता.रोहतक : महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय (एमडीयू) परिसर में देश के वीर जवानों की याद में बनाया गया शहीद स्मारक आज अपनी पहचान बचाने के लिए जूझ रहा है। कभी जहां छात्र, शिक्षक और पूर्व सैनिक गर्व के साथ सिर झुकाकर शहीदों को नमन करते थे, वहीं अब वहां चारों ओर उगी झाड़ियां, टूटी व्यवस्थाएं और फैली गंदगी प्रशासनिक लापरवाही की कहानी बयान कर रही हैं।
विश्वविद्यालय के मुख्य प्रवेश द्वार के पास स्थित यह स्मारक अब श्रद्धा स्थल कम और वीरान जगह ज्यादा दिखाई देता है। स्मारक परिसर में लगी घास इतनी बढ़ चुकी है कि कई जगह रास्ते तक नजर नहीं आते। आसपास रखे गए सेना के टैंक भी जंग और धूल की चपेट में हैं। स्थानीय लोगों और पूर्व सैनिकों का कहना है कि यह केवल सफाई का मामला नहीं, बल्कि शहीदों के सम्मान से जुड़ा विषय है।

पूर्व सैनिक कैप्टन जगबीर मलिक ने बताया कि राष्ट्रीय पर्वों से पहले यहां केवल औपचारिक सफाई कर फोटो खिंचवा लिए जाते हैं, जबकि बाकी समय स्मारक पूरी तरह उपेक्षा का शिकार रहता है। छात्रों अभिषेक, सुमित, प्रदीप देशवाल का कहना है कि विश्वविद्यालय को शिक्षा के साथ-साथ देशभक्ति और सैन्य सम्मान की भावना को भी जीवित रखना चाहिए, लेकिन वर्तमान हालात देखकर नई पीढ़ी को गलत संदेश जा रहा है।
शहीदों की स्मृति को पार्क नहीं समझें
पूर्व सैनिकों जगबीर मलिक, हवा सिंह आदि का कहना है कि यह कोई सामान्य जगह नहीं, बल्कि उन वीर जवानों की याद का प्रतीक है जिन्होंने देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए। स्मारक के आसपास फैली गंदगी और अव्यवस्था यह दर्शाती है कि जिम्मेदार अधिकारी इसकी गंभीरता को समझ ही नहीं रहे। उनका कहना है कि यदि समय रहते व्यवस्था नहीं सुधरी तो यह स्मारक पूरी तरह खंडहर में बदल जाएगा।

टैंकों की हालत…
स्मारक के पास रखे गए सैन्य टैंक कभी युवाओं के लिए आकर्षण और प्रेरणा का केंद्र होते थे। बच्चे और छात्र उन्हें देखकर सेना में जाने का सपना देखते थे, लेकिन अब वही टैंक झाड़ियों और धूल में दबे नजर आते हैं। कई जगह पेंट उखड़ चुका है और आसपास कचरा फैला हुआ दिखाई देता है। लोगों का कहना है कि सेना के प्रतीकों के साथ ऐसा व्यवहार शर्मनाक है।
केवल वीआईपी दौरों से पहले जागता प्रशासन
आरोप है कि जब कोई बड़ा कार्यक्रम या अधिकारी का दौरा होता है, तभी स्मारक परिसर में सफाई अभियान चलाया जाता है। कुछ घंटों में घास कटती है, रंग-रोगन होता है और फिर अगले ही दिन सब पहले जैसा हो जाता है। लोगों ने सवाल उठाया कि क्या शहीदों का सम्मान सिर्फ औपचारिक कार्यक्रमों तक सीमित रह गया है।
छात्रों ने मांगी स्थायी देखरेख समिति
विश्वविद्यालय के छात्र प्रदीप, सुमित, रोहित आदि ने मांग उठाई है कि स्मारक की देखरेख के लिए अलग समिति बनाई जाए। उनका कहना है कि एनसीसी, एनएसएस और छात्र संगठनों को भी इससे जोड़ा जाए ताकि नियमित सफाई और रखरखाव हो सके। छात्रों ने यह भी सुझाव दिया कि यहां हर महीने श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए जाएं, जिससे युवाओं में देशभक्ति की भावना मजबूत हो।

यह केवल स्मारक नहीं, भावनाओं का केंद्र
समाजसेवियों का कहना है कि शहीद स्मारक किसी इमारत का हिस्सा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की भावनाओं से जुड़ा स्थान होता है। यहां आने वाला हर व्यक्ति देश के प्रति सम्मान और गर्व महसूस करता है। यदि ऐसे स्थानों की उपेक्षा होगी तो आने वाली पीढ़ियों में शहीदों के प्रति संवेदनाएं कमजोर पड़ सकती हैं।
लोगों ने उठाई ये मांगें
शहरवासियों और पूर्व सैनिकों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से मांग की है कि स्मारक परिसर की नियमित सफाई सुनिश्चित की जाए, खराब लाइटों और टूटी संरचनाओं को ठीक कराया जाए तथा यहां सुरक्षा और रखरखाव के स्थायी इंतजाम किए जाएं। साथ ही सेना से जुड़े प्रेरणादायक संदेश और शहीदों की जानकारी भी परिसर में प्रदर्शित करने की मांग उठाई गई है।

