कविता.रोहतक: जिला बार एसोसिएशन के चुनाव की तस्वीर अब पूरी तरह साफ हो गई है। नामांकन वापसी के अंतिम दिन दो पूर्व प्रधानों अरविंद श्योराण और दीपक कुंडू के नाम वापस लेने के बाद चुनावी मुकाबले ने नया मोड़ ले लिया है। प्रधान पद पर अब छह प्रत्याशी मैदान में हैं, जबकि महासचिव पद के लिए पांच उम्मीदवारों के बीच मुकाबला होगा। पुरुष कार्यकारी सदस्य के चार पदों के लिए 20 दावेदार चुनाव लड़ेंगे। वहीं महिला कार्यकारी सदस्य के दोनों पदों पर निर्मला देवी रूहिल और रेनू शर्मा निर्विरोध निर्वाचित हो चुकी हैं।
यानी बार के अधिकांश महत्वपूर्ण पदों पर 11 सितंबर को अधिवक्ताओं का वोट नई कार्यकारिणी की दिशा तय करेगा। इस चुनाव की खास बात यह है कि प्रमुख पदों पर सीधा आमने-सामने का मुकाबला नहीं है, बल्कि कई उम्मीदवारों के बीच वोटों का बंटवारा होना तय माना जा रहा है।
अरविंद श्योराण का मैदान से हटकर हरीश स्वरूप हुड्डा को आगे करना और मौजूदा प्रधान दीपक हुड्डा का आरोपों पर खुलकर जवाब देना यह संकेत देता है कि चुनाव अब केवल पद हासिल करने की लड़ाई नहीं रहा, बल्कि बार की आगे की नेतृत्व दिशा को लेकर भी मुकाबला बन गया है।
प्रधान पद बना सबसे बड़ा मुकाबला
प्रधान पद पर इस बार चुनावी तस्वीर कई स्तरों पर दिलचस्प हो गई है। नामांकन वापसी के बाद छह प्रत्याशी मैदान में हैं। दो पूर्व प्रधानों के नाम वापस लेने से पहले से बन रहे समीकरणों में बदलाव आया है। खास तौर पर पूर्व प्रधान अरविंद श्योराण का अपना नाम वापस लेकर हरीश स्वरूप हुड्डा को चुनाव मैदान में उतारना महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। दूसरी ओर मौजूदा प्रधान एवं प्रधान पद के उम्मीदवार दीपक हुड्डा इस पूरे घटनाक्रम को अलग नजरिए से देख रहे हैं। उनका कहना है कि अरविंद श्योराण ने अपना नामांकन स्वयं वापस लिया है और वर्तमान नेतृत्व की इसमें कोई भूमिका नहीं है।
महासचिव पर पांच उम्मीदवार, वोटों का बंटवारा बना सबसे बड़ा फैक्टर
महासचिव पद पर पांच प्रत्याशियों के मैदान में रहने से यहां भी मुकाबला बहुकोणीय हो गया है। प्रधान पद के मुकाबले के साथ महासचिव का चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पद बार एसोसिएशन के रोजमर्रा के संगठनात्मक कामकाज में अहम भूमिका निभाता है। पांच प्रत्याशियों के बीच वोट बंटने की स्थिति में किसी उम्मीदवार के लिए अपने समर्थकों का पूरा मतदान कराना सबसे बड़ी चुनौती होगी। ऐसे चुनाव में अंतिम समय का व्यक्तिगत संपर्क, अधिवक्ताओं के छोटे समूहों में पकड़ और मतदान के दिन की रणनीति परिणाम बदल सकती है।
चार कार्यकारी पदों के लिए 20 उम्मीदवार, सबसे ज्यादा घमासान यहीं
कार्यकारी सदस्य पद का चुनाव भी किसी तरह कम रोचक नहीं है। पुरुष कार्यकारी सदस्य के चार पदों के लिए 20 प्रत्याशी मैदान में हैं। एक उम्मीदवार सुनील जटायन के नामांकन वापस लेने के बाद भी मुकाबला काफी बड़ा है। चार पदों के लिए 20 उम्मीदवार होने का सीधा मतलब है कि यहां हर वोट महत्वपूर्ण होगा। कार्यकारी सदस्य का चुनाव मुख्य पदों से अलग तरीके से भी परिणाम दे सकता है। कई उम्मीदवारों का अपना व्यक्तिगत प्रभाव और अलग समर्थन आधार हो सकता है। इसलिए यह संभव है कि प्रधान पद पर एक खेमे का प्रत्याशी जीत हासिल करे, लेकिन कार्यकारी सदस्य के पदों पर अलग-अलग समूहों के उम्मीदवार चुने जाएं।
उपप्रधान से लाइब्रेरी इंचार्ज तक मुकाबला, हर पद पर अलग समीकरण
प्रधान और महासचिव के अलावा भी चुनावी मुकाबला कई पदों पर रोचक बना हुआ है। पुरुष उपप्रधान पद के लिए चार प्रत्याशी, महिला उपप्रधान पद के लिए छह प्रत्याशी और संयुक्त सचिव पद के लिए दो प्रत्याशी मैदान में हैं। लाइब्रेरी इंचार्ज पद पर भी प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं। इन पदों पर उम्मीदवारों की संख्या को देखते हुए यह चुनाव केवल प्रधान और महासचिव तक सीमित नहीं रहेगा। नई कार्यकारिणी का वास्तविक स्वरूप इन सभी पदों के परिणाम से सामने आएगा। खास बात यह है कि कुछ पदों पर सीधा मुकाबला है तो कुछ पर बहुकोणीय संघर्ष है। ऐसे में मतदान के बाद बार के भीतर समर्थन का वास्तविक संतुलन भी सामने आएगा।


