Thursday, October 8, 2026
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पीजीआई रोहतक की पुरानी इमारत दे रही खतरे का संकेत, 22 दिन में दो बार मरीजों पर गिरा लैंटर का मलबा

कविता.रोहतक : पीजीआई रोहतक में मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं, लेकिन यहां अब एक नया डर मरीजों और उनके परिजनों को सताने लगा है कि कहीं अस्पताल की छत ही सिर पर न आ गिरे। महज 22 दिन के भीतर पीजीआई में दो ऐसी घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिनमें छत का लेंटर और प्लास्टर मरीजों के बेड पर आ गिरा।

पहली घटना में 14 सितंबर को जच्चा-बच्चा वार्ड-2 में मरीज के बेड पर मलबा गिरा तो दूसरी घटना 6 अक्टूबर को वार्ड-4 में हुई, जहां बेड पर लेटी महिला के ऊपर छत का हिस्सा गिरने से उसके हाथ में फ्रैक्चर हो गया। लगातार सामने आ रही इन घटनाओं ने पीजीआई की दशकों पुरानी इमारत की मजबूती और मरीजों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुरानी इमारत खतरे का संकेत दे रही है, जिसे समय रहते पहचान जाना चाहिए और ठोस कदम भी उठाने चाहिए।

पहला हादसा: बेड पर आ गिरा छत का मलबा

14 सितंबर को पीजीआई के जच्चा-बच्चा यानी गायनी वार्ड-2 में उस समय हड़कंप मच गया, जब छत का लेंटर और प्लास्टर टूटकर सीधे मरीज के बेड पर जा गिरा। अचानक ऊपर से मलबा गिरने से वार्ड में मौजूद मरीजों और उनके परिजनों में अफरा-तफरी मच गई। गनीमत रही कि इस घटना में कोई बड़ी जनहानि नहीं हुई। लेकिन घटना ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया कि जिस जगह मरीजों को सुरक्षित वातावरण में इलाज मिलना चाहिए, वहां छत का प्लास्टर भी भरोसेमंद नहीं रह गया है।

दूसरी बार महिला के हाथ में हुआ फ्रैक्चर

पहली घटना के बाद उम्मीद थी कि अस्पताल प्रशासन गंभीरता से ऐसी जगहों का निरीक्षण करवाएगा, लेकिन 22 दिन बाद ही 6 अक्टूबर को वार्ड-4 में फिर वैसी ही घटना सामने आ गई। इस बार बेड पर लेटी महिला मरीज के ऊपर छत के लेंटर-प्लास्टर का हिस्सा गिर गया। मलबा गिरने से महिला के हाथ में फ्रैक्चर हो गया। यानी इस बार खतरा सिर्फ अफरा-तफरी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक मरीज को चोट भी लगी। लगातार दो घटनाओं ने अस्पताल की बिल्डिंग की सुरक्षा व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

1963 की बनी इमारत, अब हर कोने का सुरक्षा ऑडिट जरूरी

पीजीआई की मुख्य पुरानी इमारत करीब 1963 के आसपास बनी बताई जाती है। समय के साथ अस्पताल में कई हिस्सों का रेनोवेशन और मरम्मत का काम होता रहा है, लेकिन दशकों पुरानी इमारत के सामने अब उम्र के साथ मजबूती का सवाल भी खड़ा हो रहा है। अस्पताल जैसी जगह पर सिर्फ दिखाई देने वाली टूट-फूट की मरम्मत पर्याप्त नहीं है। छत, लेंटर, बीम, कॉलम, प्लास्टर और दूसरे हिस्सों की तकनीकी जांच जरूरी है, ताकि यह पता चल सके कि कौन सा हिस्सा सुरक्षित है और कहां तत्काल मरम्मत या पुनर्निर्माण की जरूरत है।

क्या बड़े हादसे के बाद होगी मरम्मत

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब एक ही अस्पताल में 22 दिन के भीतर दो बार छत का हिस्सा मरीजों के ऊपर गिर चुका है, तो क्या पूरे परिसर की सुरक्षा जांच की गई है। अगर जांच हुई है तो क्या जर्जर हिस्सों की पहचान की गई और उन्हें ठीक किया गया। और अगर अभी तक व्यापक निरीक्षण नहीं हुआ है तो मरीजों की सुरक्षा के लिए इसका इंतजार क्यों। एक जगह से प्लास्टर गिरने की घटना को सामान्य मानकर नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है, क्योंकि कमजोर लेंटर या अन्य संरचनात्मक हिस्सा कभी भी बड़े हादसे का कारण बन सकता है।

अब बड़ी मरम्मत या पुनर्निर्माण की जरूरत

पीजीआई प्रदेश के बड़े चिकित्सा संस्थानों में शामिल है और यहां रोजाना बड़ी संख्या में मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में अस्पताल की इमारत का सुरक्षित होना किसी सुविधा से ज्यादा जरूरी है। लगातार सामने आ रही घटनाओं को देखते हुए पुराने भवन का विशेषज्ञों से स्ट्रक्चरल ऑडिट करवाना चाहिए। जहां मरम्मत से काम चल सकता है, वहां मजबूत और स्थायी मरम्मत हो तथा जिन हिस्सों की हालत ज्यादा खराब है, उन्हें दोबारा बनाने पर गंभीरता से विचार किया जाए। मरीजों को इलाज के दौरान इस डर में नहीं रहना चाहिए कि अगला मलबा उनके बेड पर गिरेगा या किसी और के बैड पर।

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