चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार के वैज्ञानिकों द्वारा कृषि क्षेत्र की समस्याओं एवं चुनौतियों के समाधान सुनिश्चित करने की दिशा में निरंतर शोध कार्य किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में ‘फलेरिश माइनर में प्रतिरोधकता से निपटने के लिए नए रसायनों की खोज, उनकी संरचना एवं उपयोग करने’ के लिए विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक शोध करेंगे। जिसके लिए हरियाणा राज्य उच्चतर शिक्षा परिषद एवं हरियाणा राज्य अनुसंधान कोष द्वारा स्वीकृत दो वर्षीय परियोजना के तहत इस शोध को स्वीकृत किया गया है। इस परियोजना के तहत शोध कार्यों के लिए 27.19 लाख रुपये की धनराशि स्वीकृत की गई है।
यह परियोजना रसायन विज्ञान विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. जयंत सिंधु के नेतृत्व में संचालित होगी, जबकि डॉ. अनिल दुहन और डॉ. वीरेंद्र सिंह हुड्डा सह-अन्वेषक के रूप में परियोजना में अपना योगदान देंगे।
कुलपति प्रो. बलदेव राज काम्बोज ने बताया कि गुल्ली-डंडा/लिटिल सीड कैनरी ग्रास के नाम से जाना जाता है, गेहूं की फसल में पाया जाने वाला यह प्रमुख एवं अत्यधिक नुकसानदायक खरपतवार है। कई क्षेत्रों में यह खरपतवार उन शाकनाशियों के प्रति कम संवेदनशील होता जा रहा है, जो पहले इसके नियंत्रण में प्रभावी थे। नए खरपतवार नाशकों के अभाव में यह समस्या लगातार विकराल होती जा रही है व किसानों के लिए खरपतवार नियंत्रण चुनौतीपूर्ण बनता जा रहा है।
परियोजना के तहत शाकनाशी-प्रतिरोधी गुल्ली डंडा के विरुद्ध नए एवं प्रभावी रसायनों के डिजाइन, विकास एवं उपयोग पर विशेष ध्यान दिया जाएगा जोकि इस शोध का मूल आधार है। शोध सफल होने पर किसानों को प्रतिरोधी खरपतवारों के अधिक प्रभावी प्रबंधन में मदद मिल सकती है। इससे गेहूं की फसल में होने वाले नुकसान को कम करने, उत्पादकता बढ़ाने तथा खेती की लागत को नियंत्रित करने में सहायता मिलेगी। साथ ही, ऐसे शाकनाशियों पर निर्भरता भी कम हो सकेगी जिनकी प्रभावशीलता लगातार घट रही है।
इस अवसर पर ओएसडी डॉ. अतुल ढींगड़ा, मौलिक विज्ञान एवं मानविकी महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. राजेश गेरा, केमेस्ट्री विभाग के अध्यक्ष डॉ. रजनीकांत शर्मा व मीडिया एडवाइजर डॉ. संदीप आर्य उपस्थित रहे।


