पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कहा है कि फसल बीमा योजना किसानों के लिए सिर्फ छलावा साबित हुई है। जब ये योजना शुरू हुई तो बड़े-बड़े दावे किए गए थे। लेकिन आज हालात यह है कि इसके लाभार्थियों की संख्या घटकर आधी से भी काम रह गई है। इसबार तो खुद सरकार ने खरीफ सीजन के लिए किसानों को पंजीकरण का उचित समय तक नहीं दिया।1 जो अधिसूचना हर साल 20 से 25 जून के बीच में जारी होती थी, वह इस बार 24 जुलाई को जारी की गई। यानी 11.20 लाख किसानों को पंजीकरण के लिए मुश्किल से एक हफ्ते का समय दिया गया।
ऐसा लगता है कि सिर्फ किसान ही नहीं, खुद सरकार का अपनी इस योजना से मोहभंग हो गया है। क्योंकि अब तक यह योजना जिस तरह चली है, उसे स्पष्ट है कि इससे किसानों को रत्तीभर भी लाभ नहीं हुआ, उल्टा उनसे हजारों करोड रुपए लूटकर निजी कंपनियों की तिजोरियां भरी गईं।
इसलिए 2018-19 में इस योजना के तहत लाभार्थियों की जो संख्या लगभग 24 लाख थी, वह 2024-25 आते-आते मात्र 11 लाख रह गई। इसमें भी आशंका है कि इसबार कम समय होने, सर्वर ठप होने व अन्य प्रशासनिक खानापूर्ति के चक्कर में ही किसानों का ज्यादा समय चला जाएगा और सारे किसान इसके लिए आवेदन तक नहीं कर पाएंगे।
भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने आवेदन की तिथि आगे बढ़ाने की मांग उठाई है। साथ ही कहा है कि सरकार निजी कंपनियों को लाभ पहुंचाने की बजाय, किसानहित के बारे में सोच और जरूरत पड़ने पर किसानों को तुरंत मुआवजा दे। अब तक जो पिछला मुआवजा बकाया है, उसका तुरंत प्रभाव से भुगतान किया जाए। साथ ही बीजेपी सरकार जवाब दे कि इस योजना के तहत हर साल मुआवजे की राशि क्यों घटती जा रही है और प्रिमियम की राशि क्यों बढ़ती जा रही है।
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की ओर से कृषि राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने बताया कि 2022-23 में हरियाणा में फसल बीमा के अंतर्गत ₹2,518.66 करोड़ का भुगतान किया गया था, जो 2023-24 में घटकर मात्र ₹265.23 करोड़ रह गया । जबकि, वर्ष 2023-24 में किसानों से 154.9 करोड़ रुपये, केंद्र सरकार से 246.6 करोड़ रुपये और इतना ही राज्य का हिस्सा माना जाए तो यह बीमा कंपनी की तिजोरी में 648.1 करोड़ रुपये की धनराशि गई, यानी बीमा कंपनी को 382.9 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा हुआ।
इसी तरह 2024-25 में यह राशि और भी कम होकर ₹262.6 करोड़ रह गई। जबकि, वर्ष 2024-25 में किसानों से 280.3 करोड़ रुपये, केंद्र सरकार से 388.2 करोड़ रुपये और 50% के आधार पर राज्य का हिस्सा 388.2 करोड़ रुपये प्रीमियम माना जाए तो बीमा कंपनी की तिजोरी में 1056.7 करोड़ रुपये पहुंचे। लेकिन किसानों को सिर्फ 262.6 करोड़ रुपये का ही भुगतान हुआ, यानी बीमा कंपनी को 794.1 करोड़ का शुद्ध मुनाफा हुआ।
इससे यह स्पष्ट हो गया कि बीमा कम्पनियां इस योजना की आड़ में किसानों और सरकारी खजाने दोनों को लूट रही हैं। PM फसल बीमा योजना ने किसान को कंगाल और बीमा कंपनियों को मालामाल बना दिया है।
हरियाणा के किसानों से तय समय पर बीमा कंपनियां प्रिमियम तो काट लेती हैं, लेकिन जब मुआवजा देने की बारी आती है तो न समय तय होता है न मुआवजा। इतना ही नहीं, फसल नुकसान का आंकलन करने वाली समिति में किसानों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। सरकार और बीमा कंपनियां मिलकर क्लेम निपटारे में मनमानी कर रही हैं, जिसका खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ रहा है।


