हिसार : चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के मत्स्य विज्ञान महाविद्यालय तथा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अंतर्गत कार्यरत सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ ब्रैकिशवॉटर एक्वाकल्चर (सीआईबीए), चेन्नई के बीच मत्स्य पालन एवं जलीय कृषि के क्षेत्र में अनुसंधान, तकनीकी सहयोग तथा किसानों के प्रशिक्षण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं।
समझौते पर हकृवि की ओर से अनुसंधान निदेशक डॉ. राजबीर गर्ग तथा मानव संसाधन प्रबंधन निदेशक डॉ रमेश यादव ने जबकि सीआईबीए, चेन्नई की ओर से निदेशक डॉ. कुलदीप लाल एवं प्रधान वैज्ञानिक डॉ प्रसन्ना कुमार पाटिल ने हस्ताक्षर किए।
किसानों की आय में वृद्धि और रोजगार के अवसर भी होंगे उपलब्ध: कुलपति
कुलपति प्रो बलदेव राज काम्बोज ने बताया कि हरियाणा के अनेक क्षेत्रों में जलभराव (वाटर लॉगिंग) तथा भूमिगत खारे पानी (अंडरग्राउंड सलाइन वॉटर) की समस्या के कारण कृषि उत्पादन प्रभावित होता है। ऐसे क्षेत्रों में पारंपरिक खेती आर्थिक रूप से लाभकारी नहीं रह जाती। अब इस समझौते के माध्यम से अनुपयोगी/ कम उत्पादक भूमि क्षेत्रों को मत्स्य पालन के लिए उपयोग में लाने की दिशा में वैज्ञानिक प्रयास किए जाएंगे। उन्होंने बताया कि इससे बंजर भूमि को मत्स्य पालन के व्यवसाय में शामिल किया जाएगा जिससे किसानों कि आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होगी और अनेक लोगों को रोजगार भी मिलेगा। उन्होंने बताया कि ऐसे क्षेत्रों में उपयुक्त मछली प्रजातियों का चयन, जल गुणवत्ता परीक्षण तथा प्रतिष्ठित संस्थानों के मार्गदर्शन में मत्स्य पालन करना अधिक लाभदायक रहेगा। कुलपति प्रो काम्बोज ने बताया कि मत्स्य पालन से अनुपयोगी भूमि का उपयोग होगा जिससे अतिरिक्त आय का स्रोत, रोजगार सृजन, जल संसाधनों का बेहतर उपयोग, फसल जोखिम में कमी, पोषण सुरक्षा, निर्यात एवं बाजार के अवसर भी बढ़ेंगे।
सीआईबीए खारे पानी एवं जलीय कृषि क्षेत्र में अनुसंधान एवं तकनीकी विकास का अग्रणी संस्थान: डॉ कुलदीप लाल
सीआईबीए निदेशक एवं प्रधान वैज्ञानिक डॉ कुलदीप लाल ने बताया कि यह देश का एक अग्रणी संस्थान है, जो खारे पानी में जलीय कृषि (ब्रैकिशवॉटर एक्वाकल्चर) के क्षेत्र में अनुसंधान एवं तकनीकी विकास का कार्य करता है। संस्थान की विशेषज्ञता का लाभ हरियाणा के किसानों को उपलब्ध कराया जाएगा, जिससे खारे पानी एवं जलभराव वाले क्षेत्रों में भी व्यावसायिक मत्स्य पालन को बढ़ावा मिल सकेगा।
अनुसंधान निदेशक डॉ. राजबीर गर्ग ने बताया कि प्रदेश के जिन क्षेत्रों में कृषि करना कठिन है और जहां पानी की लवणता अधिक है, वहां वैज्ञानिक तकनीकों के माध्यम से मत्स्य पालन एक लाभदायक विकल्प सिद्ध हो सकता है। इससे न केवल अनुपयोगी भूमि का सदुपयोग होगा, बल्कि किसानों के लिए रोजगार एवं अतिरिक्त आय के नए अवसर भी सृजित होंगे।

