- गैंग कल्चर की गिरफ्त में गांव
- गुरुग्राम एनकाउंटर के बाद उठ रहे कई सवाल
कविता.रोहतक : गुरुग्राम में हुए पुलिस एनकाउंटर में मारे गए चार बदमाशों में से तीन रोहतक के गांव भालौठ के रहने वाले थे। इनमें दो नाबालिग थे। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इनमें एक किशोर जैवेलीन थ्रो का गोल्ड मेडलिस्ट था, जबकि दूसरा युवक घर से कांवड़ लाने की बात कहकर निकला था।
तीसरे पर पहले कुछ आपराधिक मामले दर्ज थे, लेकिन परिजन बताते हैं कि वह मजदूरी कर रहा था। तीनों के बारे में गांव के लोगों का कहना है कि वे सामान्य युवाओं की तरह रहते थे। किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि उनका नाम किसी गैंग से जुड़ जाएगा।
प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, तीनों एक ऐसे गैंग के संपर्क में थे, जिसका संचालन विदेश में बैठे गैंगस्टर दीपक नांदल से जुड़ा बताया जा रहा है। इस घटना ने केवल एक पुलिस कार्रवाई का नहीं, बल्कि पूरे समाज के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। आखिर गांवों के सामान्य, खेलकूद करने वाले और साधारण परिवारों के युवा अपराध की दुनिया तक कैसे पहुंच रहे हैं? यह बदलाव कब और कैसे हो रहा है कि परिवार, गांव और समाज को इसकी भनक तक नहीं लगती। युवाओं में गैंगस्टरों की बढ़ती पकड़ अब केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं रह गई है। यह सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और आर्थिक चुनौती बन चुकी है।
सोशल मीडिया पर गैंगस्टरों की चमक-दमक, हथियारों के साथ वीडियो, महंगी गाड़ियां और कथित रुतबा कई युवाओं को प्रभावित कर रहे हैं। अपराध का वास्तविक चेहरा जेल, मौत और बर्बादी है, लेकिन सोशल मीडिया पर दिखाई जाने वाली झूठी शान कई किशोरों को आकर्षित कर रही है।
गैंगस्टर की चमक-दमक का झूठा आकर्षण
विशेषज्ञों का मानना है कि आज अपराध पहले की तरह केवल मजबूरी नहीं, बल्कि कई युवाओं के लिए पहचान बनाने का माध्यम भी बनता जा रहा है। सोशल मीडिया पर हथियारों के साथ फोटो, महंगी गाड़ियों का प्रदर्शन, विदेश में बैठे गैंगस्टरों की कथित सफलता और गैंग से जुड़े लोगों को मिलने वाली तवज्जो किशोरों के मन में अपराध को ग्लैमर की तरह पेश करती है। कई बार शुरुआत केवल सोशल मीडिया पर संपर्क से होती है और धीरे-धीरे युवा छोटे-मोटे काम करते-करते गैंग का हिस्सा बन जाते हैं।
बेरोजगारी, जल्दी पैसा और पहचान की चाह भी बड़ा कारण
ग्रामीण क्षेत्रों में कई युवाओं के सामने रोजगार के सीमित अवसर हैं। ऐसे में यदि कोई उन्हें कम समय में ज्यादा पैसा, महंगी बाइक, हथियार और इलाके में दबदबा दिलाने का सपना दिखाता है तो कुछ युवा उसके जाल में फंस जाते हैं। कई मामलों में गैंग पहले छोटे काम करवाते हैं, फिर युवक अपराध के ऐसे चक्र में फंस जाता है, जहां से लौटना आसान नहीं होता। कई बार डर, लालच और गैंग की धमकियां भी उन्हें बाहर निकलने नहीं देतीं।
परिवार और गांव को आखिर पता क्यों नहीं चलता
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जो युवक रोज गांव में घूमता है, खेल की प्रैक्टिस करता है या मजदूरी करता है, उसके अपराध की दुनिया से जुड़ने की भनक परिवार और समाज को क्यों नहीं लगती। विशेषज्ञ मानते हैं कि मोबाइल और सोशल मीडिया ने युवाओं की समानांतर दुनिया बना दी है। कई बार उनकी नई संगत, ऑनलाइन संपर्क और गतिविधियों पर किसी की नजर नहीं होती। परिवार भी यह मानकर चलता है कि बच्चा घर पर है तो सुरक्षित है, जबकि उसका संपर्क अपराधियों से डिजिटल माध्यमों के जरिए बन चुका होता है।
बंदूक से पहले दिमाग पर कब्जा, यहीं से शुरू होती है गैंग की भर्ती
आज गैंगस्टरों को हथियार उठाने वाले युवाओं की तलाश नहीं करनी पड़ती। सोशल मीडिया यह काम आसान कर चुका है। इंस्टाग्राम की रीलों में हथियार, लग्जरी गाड़ियां, विदेशी ठिकाने, लाखों फॉलोअर्स और भाई वाली छवि कई किशोरों को प्रभावित कर रही है। गैंग पहले दोस्ती करते हैं, फिर छोटे-छोटे काम देते हैं, इसके बाद पैसा, रुतबा और सुरक्षा का लालच देकर उन्हें अपने नेटवर्क में शामिल कर लेते हैं। कई युवाओं को लगता है कि वे किसी फिल्मी किरदार की तरह ताकतवर बन रहे हैं, जबकि असलियत जेल या मौत होती है।
सिर्फ पुलिस नहीं, पूरा समाज बनेगा ढाल तभी रुकेगा गैंग कल्चर
गैंगस्टर बनने के बाद पुलिस के पास केवल दो रास्ते बचते हैं, गिरफ्तारी या मुठभेड़। इसलिए लड़ाई अपराध होने से पहले शुरू करनी होगी। गांवों में खेल गतिविधियों को बढ़ावा देना होगा। स्कूलों में गैंग कल्चर के खिलाफ विशेष जागरूकता अभियान चलाने होंगे। पंचायतों को जोखिम वाले युवाओं की पहचान कर उनकी काउंसलिंग करानी होगी। पुलिस को साइबर मॉनिटरिंग और बीट इंटेलिजेंस मजबूत करनी होगी। परिवारों को बच्चों की डिजिटल दुनिया, दोस्ती और व्यवहार में हो रहे बदलाव पर पहले से ज्यादा नजर रखनी होगी।
दो मिनट की भाईगिरी पूरी जिंदगी की बर्बादी
गैंगस्टर बनने का रास्ता बाहर से जितना चमकदार दिखता है, उसकी मंजिल उतनी ही भयावह होती है। सोशल मीडिया पर हथियार, महंगी गाड़ियां और दबदबे वाली तस्वीरें युवाओं को आकर्षित कर सकती हैं, लेकिन इन तस्वीरों के पीछे की सच्चाई अक्सर जेल की सलाखें, पुलिस की तलाश, परिवार की बदनामी, अदालतों के चक्कर और असमय मौत होती है। हरियाणा में पिछले कुछ वर्षों में जिन युवाओं ने गैंग का रास्ता चुना, उनमें बड़ी संख्या ऐसी है जिनका अंत या तो एनकाउंटर में हुआ, या वे लंबे समय से जेल में हैं, या फिर अपने परिवार से दूर भगोड़े जीवन जीने को मजबूर हैं। युवाओं के लिए सबसे बड़ा संदेश यही है कि असली पहचान बंदूक से नहीं, हुनर, मेहनत, शिक्षा और खेल के मैदान में मिली सफलता से बनती है। अपराध का रास्ता जितनी तेजी से ऊपर उठाता दिखता है, उससे कहीं ज्यादा तेजी से जिंदगी को अंधेरे में धकेल देता है।
बड़े सवाल
- क्या सोशल मीडिया गैंगस्टरों का सबसे बड़ा भर्ती प्लेटफॉर्म बनता जा रहा है?
- विदेश में बैठे गैंगस्टर गांवों तक अपनी पहुंच कैसे बना रहे हैं?
- क्या परिवार और समाज युवाओं की बदलती मानसिकता को समय रहते पहचान पा रहे हैं?
- क्या स्कूल और कॉलेज स्तर पर अपराध से बचाव को लेकर पर्याप्त जागरूकता है?
- क्या केवल पुलिस कार्रवाई से इस समस्या का समाधान संभव है?
ये हो सकता है समाधान
- गांव स्तर पर जोखिम वाले युवाओं की पहचान कर नियमित काउंसलिंग।
- स्कूलों और कॉलेजों में गैंग कल्चर के दुष्परिणाम पर विशेष अभियान।
- खेल, रोजगार और कौशल विकास के अवसर बढ़ाना।
- सोशल मीडिया पर गैंगस्टरों के प्रचार और नेटवर्क पर सख्त निगरानी।
- परिवारों को डिजिटल गतिविधियों और युवाओं की संगत पर सतर्क रहने के लिए जागरूक करना।

