हिसार : चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय ने कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान, (अटारी) जोधपुर के सहयोग से हरियाणा के प्रमुख धान उत्पादक जिलों में कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से वर्तमान धान कटाई सीजन में फसल अवशेष प्रबंधन अभियान तेज कर दिया है। अभियान का मुख्य उद्देश्य पराली जलाने की समस्या को रोकना तथा किसानों को इन-सीटू (खेत में) एवं एक्स-सीटू (खेत से बाहर) फसल अवशेष प्रबंधन की व्यावहारिक, किफायती और स्थानीय रूप से उपलब्ध तकनीकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना है।
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बी. आर. काम्बोज ने कहा कि फसल अवशेषों का वैज्ञानिक प्रबंधन वायु प्रदूषण की रोकथाम के साथ-साथ मृदा स्वास्थ्य, नमी संरक्षण, ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी और गेहूं की समय पर बुवाई के लिए भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने किसानों से धान की पराली को कृषि संसाधन के रूप में देखते हुए वैज्ञानिक प्रबंधन तकनीकों को अपनाने तथा ‘फसल अवशेष न जलाने’ को सामूहिक संकल्प बनाने की अपील की। सितंबर माह में हकृवि द्वारा लगभग 6000 किसानों तक पहुंचने का लक्ष्य रखा गया है। इसके तहत 46 ग्राम स्तरीय, 14 खंड स्तरीय, 12 जिला स्तरीय जागरूकता कार्यक्रम तथा 17 विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इन कार्यक्रमों में किसानों को खेत स्तर पर प्रदर्शन एवं व्यावहारिक प्रशिक्षण के माध्यम से फसल अवशेष प्रबंधन की उपयुक्त तकनीकों की जानकारी दी जाएगी। यह अभियान आगामी महीनों में भी जारी रहेगा तथा गेहूं की बिजाई शुरू होने तक किसानों को निरंतर तकनीकी मार्गदर्शन एवं आवश्यक सलाह उपलब्ध कराई जाएगी।
कुलपति ने बताया कि कृषि विज्ञान केंद्रों द्वारा कृषि एवं किसान कल्याण विभाग, जिला प्रशासन, किसान उत्पादक संगठनों, सहकारी समितियों, कस्टम हायरिंग सेंटरों तथा अन्य संबंधित संस्थाओं के साथ समन्वय किया जा रहा है, ताकि किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन के लिए आवश्यक मशीनरी, संसाधन एवं तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध हो सकें। किसानों को पराली जलाने के बजाय उसे खेत में ही उचित ढंग से प्रबंधित करने तथा पशु चारे, जैव ऊर्जा व अन्य मूल्यवर्धित उत्पादों के लिए उपयोग करने के विकल्पों की जानकारी दी जा रही है।
विस्तार शिक्षा निदेशक डॉ. नरेश कौशिक ने बताया कि कृषि विज्ञान केंद्र किसानों को सरकारी योजनाओं के अंतर्गत उपलब्ध वित्तीय सहायता एवं अन्य सहयोग की जानकारी भी प्रदान कर रहे हैं, ताकि फसल अवशेष प्रबंधन तकनीकों को अपनाना उनके लिए आसान एवं किफायती हो सके। उन्होंने कहा कि ‘फसल अवशेष कचरा नहीं, बल्कि एक मूल्यवान संसाधन है’। उन्होंने बताया कि केवीके नेटवर्क का उद्देश्य फसल अवशेष प्रबंधन को मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, संसाधन बचत, गेहूं की समय पर बिजाई, ग्रामीण उद्यमिता और जलवायु-सक्षम कृषि से जोड़ना है।


