कविता.रोहतक: जिले में संचालित आंगनबाड़ी केंद्रों के जरिए बच्चों और गर्भवती महिलाओं को पोषण उपलब्ध कराने की सरकारी व्यवस्था जमीनी स्तर पर कई चुनौतियों से जूझती दिखाई दे रही है।
केंद्रों पर निर्धारित संख्या के मुकाबले बच्चों की उपस्थिति कम रहने, पोषाहार वितरण में अनियमितता और कर्मचारियों पर बढ़ते कार्यभार के कारण योजना का अपेक्षित लाभ सभी जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पा रहा है। ऐसे में पोषण अभियान के प्रभाव को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
हजारों बच्चों को जोड़ने का दावा
महिला एवं बाल विकास विभाग के आंकड़ों के अनुसार जिले में 1004 आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हैं। इन केंद्रों के माध्यम से छह माह से छह वर्ष तक के 64 हजार से अधिक बच्चों को पोषण सेवाओं से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। रोहतक शहरी क्षेत्र में सबसे अधिक बच्चे पंजीकृत हैं, जबकि महम, कलानौर, सांपला, चिड़ी और ग्रामीण क्षेत्रों में भी बड़ी संख्या में लाभार्थी दर्ज हैं। हालांकि वास्तविक उपस्थिति और पंजीकृत संख्या के बीच अंतर देखने को मिल रहा है।
जिले में इतने बच्चे हैं पंजीकृत*
रोहतक शहरी : 18,754
चिड़ी ब्लॉक : 5,164
कलानौर ब्लॉक : 8,270
महम ब्लॉक : 11,544
रोहतक ग्रामीण : 12,919
सांपला ब्लॉक : 7,989
कुल- 6 माह से 6 वर्ष आयु के बच्चे : 64,640
रिकॉर्ड में ज्यादा, केंद्रों पर कम बच्चे
कई आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों की उपस्थिति बढ़ाने के लिए हेल्पर सुबह घर-घर जाकर उन्हें बुलाती हैं। केंद्रों पर पंजीकृत बच्चों की संख्या के अनुसार भोजन तैयार किया जाता है, लेकिन वास्तविक उपस्थिति काफी कम रहती है। कई जगह 20 बच्चों के हिसाब से खाना बनता है, जबकि केंद्र पर केवल 7 से 8 बच्चे ही पहुंचते हैं। इससे तैयार भोजन और वास्तविक लाभार्थियों की संख्या में बड़ा अंतर दिखाई देता है।
ये है मेन्यू
विभागीय मेन्यू में बच्चों के लिए दूध, खीर, प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थ, पंजीरी, दलिया और अन्य पौष्टिक व्यंजन शामिल किए गए हैं। उद्देश्य बच्चों को संतुलित आहार उपलब्ध कराना है, ताकि कुपोषण की समस्या पर नियंत्रण पाया जा सके। लेकिन कई अभिभावकों का कहना है कि केंद्रों पर अधिकांश समय सीमित खाद्य सामग्री ही उपलब्ध रहती है और मेन्यू में शामिल सभी वस्तुएं नियमित रूप से बच्चों तक नहीं पहुंच पातीं।
रिकॉर्ड से लेकर सर्वे तक, बढ़ा जिम्मेदारियों का दायरा
आंगनबाड़ी वर्करों और हेल्परों की जिम्मेदारी केवल बच्चों को भोजन उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। उन्हें गर्भवती महिलाओं का रिकॉर्ड तैयार करने, स्वास्थ्य और पोषण संबंधी सर्वे करने, बच्चों की वृद्धि की निगरानी रखने तथा विभिन्न सरकारी योजनाओं का डेटा भी तैयार करना पड़ता है। कर्मचारियों का कहना है कि बढ़ते प्रशासनिक कार्यों के कारण केंद्रों में बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताना मुश्किल हो जाता है।

