Thursday, August 6, 2026
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Cloud Seeding : दिल्ली में फिर से कृत्रिम बारिश की तैयारी, क्लाउड सीडिंग पर फोकस

Cloud Seeding : दिल्ली सरकार एक बार फिर क्लाउड सीडिंग यानी कृत्रिम बारिश कराने की योजना बना रही है। पिछली बार यह प्रयोग सफल नहीं हो पाया था, इसलिए इस बार प्रशासनिक और तकनीकी बाधाओं से बचने के लिए पहले से ही उड़ान अनुमति, विमान और पायलटों की व्यवस्था की जा रही है।

क्लाउड सीडिंग केवल खास मौसम परिस्थितियों में ही संभव होती है और इसके लिए समय बहुत सीमित होता है। थोड़ी सी देरी भी पूरे अभियान को प्रभावित कर सकती है।

पिछले साल अक्टूबर में पर्यावरण विभाग और IIT Kanpur ने मिलकर दो परीक्षण किए थे। हालांकि बारिश नहीं हुई, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार लक्षित क्षेत्रों में वायु प्रदूषण के कणों में कमी दर्ज की गई थी। दिल्ली आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में भी भविष्य में और परीक्षण करने की बात कही गई है।

असल में कृत्रिम बारिश की प्रक्रिया में बादलों में Silver Iodide, Dry Ice या Salt जैसे एजेंट छोड़े जाते हैं। इससे बादलों में मौजूद नमी बारिश का रूप ले लेती है। यह तकनीक तभी काम करती है जब आसमान में पर्याप्त बादल मौजूद हों।

अब तक दुनिया के 53 देशों में इसका प्रयोग किया जा चुका है, लेकिन हर बार सफलता नहीं मिली। दिल्ली में भी 2019 और 2022 में प्रयास हुए थे। अक्टूबर 2025 में प्रदूषण कम करने के लिए क्लाउड सीडिंग की गई थी, लेकिन बादलों में पर्याप्त नमी न होने से यह विफल रही। उस समय प्रति ट्रायल लगभग ₹60 लाख खर्च हुआ था और कुल समझौता ₹3.21 करोड़ का था।

क्लाउड सीडिंग के लिए छोटे विमान, रॉकेट या ड्रोन का इस्तेमाल होता है। ये बादलों पर रसायन का छिड़काव करते हैं, जिससे पानी के कण भारी होकर बारिश में बदल जाते हैं। हालांकि, मौसम का सही आकलन और हवा की दिशा का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि कृत्रिम बारिश केवल अस्थायी राहत देती है। यह वायु प्रदूषण का स्थायी समाधान नहीं है और कई बार हवा की दिशा बदलने से बारिश गलत जगह पर भी हो सकती है।

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