Monday, April 13, 2026
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वीर सिपाही कुलदीप ने पूरे देश के सामने शहादत और सेवा की एक नई इबारत लिख दी….

रोहतक : अस्पताल के गलियारों में अमूमन खामोशी या दर्द की सिसकियां ही गूंजती हैं, लेकिन आज रोहतक के पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के ट्रॉमा सेंटर का माहौल कुछ अलग था। यहां दुख का समंदर तो था, लेकिन उस समंदर में गर्व की लहरें भी उठ रही थीं।

खाकी वर्दी पहने एक पुलिस का जवान, जिसने ताउम्र अपने फर्ज को अपने परिवार से ऊपर रखा, वह आज चिरनिद्रा में लीन था। लेकिन उसकी कहानी खत्म नहीं हुई थी। मौत के बाद भी वीर सिपाही कुलदीप हार मानने को तैयार नहीं थे। उसके परिवार ने आंसुओं के घूँट पीते हुए एक ऐसा फैसला लिया, जिसने पूरे देश के सामने शहादत और सेवा की एक नई इबारत लिख दी। यह कहना है पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के कुलपति डाॅ.एच.के. अग्रवाल का।

डाॅ. अग्रवाल ने कहा कि इस सिपाही के परिवार ने उसका अंगदान कर यह साबित कर दिया कि खाकी पहनने वाला सिर्फ जीते जी नहीं, बल्कि मरने के बाद भी देश का रक्षक होता है। एक तरफ जहां सिपाही का परिवार अपने जवान बेटे, पति और पिता को खोने के असीम दुख में डूबा था, वहीं दूसरी तरफ उनके इस फैसले ने कई बुझते हुए चिरागों में फिर से रोशनी भर दी।

जब टूट गया परिवार का आसमान

यह उस सिपाही की कहानी है, जो हर दिन देश और समाज की सुरक्षा के लिए घर से निकलता था। उसके बच्चे हर शाम दरवाजे पर टकटकी लगाए उसके लौटने का इंतजार करते थे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। ड्यूटी के दौरान सिर में दर्द रहने पर पता चला कि जेल वार्डन कुलदीप को ब्रेन ट्यूमर है परिवार ने दिल्ली बडे अस्पताल में आप्रेशन करवाया तो लेकिन कुछ दिन बाद से ही सिपाही चलने में असमर्थ हो गया जिससे पिछले एक साल से वह चारपाई पर था। कुछ दिनों पहले वह फिर सिर की परेशानी से पीजीआई में पहुंचा जहां न्यूरो सर्जरी की टीम ने उसका ऑपरेशन किया लेकिन वह दोबारा होश में नहीं आया। अस्पताल के आईसीयू में कई दिनों तक जिंदगी और मौत की जंग चलती रही। बाहर बैठी पत्नी की आंखों के आंसू सूख चुके थे, बच्चे भगवान से अपने पिता की सांसों की भीख मांग रहे थे।

लेकिन फिर वह कठिन घड़ी आई जब डॉक्टरों ने भारी मन से परिवार को बताया कि सिपाही ब्रेन डेड हो चुका है। उसका दिमाग अब कभी काम नहीं करेगा। यह शब्द परिवार के लिए किसी वज्रपात से कम नहीं थे। पत्नी पछाड़ खाकर गिर पड़ी, बडे भाई के कांपते हाथों से उनका सहारा छिन गया। अस्पताल का वह कोना उनकी चीखों से दहल उठा। जिस इंसान ने उम्र भर दूसरों की रक्षा की, आज उसकी अपनी धड़कनें मशीनों के सहारे चल रही थीं।

आंसुओं के बीच लिया गया वह महान संकल्प

कुलपति डाॅ.एच.के. अग्रवाल ने बताया कि जब दुख की इस अथाह गहराई में परिवार डूब रहा था, तब डॉक्टरों और सोटो की टीम ने उन्हें अंगदान के बारे में बताया। यह एक ऐसा क्षण था जहां एक तरफ अपनों को खोने की असहनीय पीड़ा थी और दूसरी तरफ अनजान लोगों को जीवन देने का मौका।

 दूसरों का सुहाग उजडने से जरूर बचाउंगी

सिपाही की बहादुर पत्नी ने अपने आंसुओं को पोंछते हुए कहा कि मेरे पति ने हमेशा कहा था कि यह शरीर देश की अमानत है। अगर आज इनके जाने से किसी का सुहाग उजड़ने से बच सकता है, किसी के घर का चिराग बुझने से बच सकता है, तो हम इनके अंग दान करेंगे। यह फैसला आसान नहीं था। अपने कलेजे के टुकड़े के शरीर के अंग सौंपना किसी भी माता-पिता या पत्नी के लिए दुनिया का सबसे मुश्किल काम होता है। लेकिन उस खाकी वाले के परिवार ने अपने दर्द को दरकिनार कर इंसानियत का जो धर्म निभाया, उसने अस्पताल में मौजूद हर शख्स की आंखें नम कर दीं।

कुलपति डाॅ. अग्रवाल भी हुए भावुक

इस भावुक और ऐतिहासिक क्षण पर पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एच. के. अग्रवाल भी खुद को रोक नहीं पाए। उनकी आंखें भी नम थीं और आवाज में एक भारीपन था।

कुलसचिव डाॅ. रूपसिंह ने कहा कि एक पुलिस वाले के परिवार ने आज अंगदान करके बता दिया कि एक सच्चा सिपाही जीते जी तो देश की सेवा करता ही है वहीं मरने के बाद भी वह देश के काम आता है। डाॅ. रूपसिंह ने कहा कि आज हम सब इस परिवार के ऋणी हैं।

 समाज के सामने पेश की नजीर

पीजीआईएमएस के निदेशक डाॅ.एस.के. सिंघल ने कहा कि इन्होंने जो दर्द सहा है, उसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। लेकिन अपने इस अपार दुख के बीच इन्होंने जो मानवता का परिचय दिया है, वह पूरे समाज के लिए एक नजीर है। डाॅ. सिंघल ने कहा कि यह सिपाही आज शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं है, लेकिन इनका लीवर आज भी किसी को खाना पचाने में मदद कर रहा है, इनकी किडनियां आज भी किसी शरीर में हैं और इसकी आंखें आज भी इस दुनिया को देख रही हैं। इससे बड़ी शहादत और इससे बड़ा दान कोई और नहीं हो सकता। डाॅ. सिंघल ने  अस्पताल प्रशासन और पूरी मेडिकल टीम की ओर से इस महान कार्य के लिए परिवार का आभार व्यक्त किया।

अंगदान के प्रति दिन प्रतिदिन बढ़ रहा रूझान

चिकित्सा अधीक्षक डाॅ. कुंदन मित्तल ने बताया कि अंगदान के प्रति लोगों का किस प्रकार रूझान बढ़ रहा है कि चार दिन पहले भिवानी जिले के जिस परिवार ने अपने बेटे का अंगदान करवाया था, उस गांव के 13000 लोग अंगदान का शपथ पत्र भरना चाहते हैं। डाॅ. कुंदन ने बताया कि यह मरीज आईसीयू में भर्ती था तो चिकित्सक डाॅ. तरुण को मरीज के ब्रेन डेड होने का अंदेशा हुआ था तो उन्होंने चिकित्सा अधीक्षक कार्यालय में सूचना दी। डाॅ. कुंदन ने कहा कि इसके बाद उनके निर्देशन में निश्चेतन विभाग से डाॅ. तरुण, न्यूरो सर्जरी से डाॅ. वरूण अग्रवाल ,डाॅ. अमरनाथ की टीम बनाई गई, जिन्होंने 12 अप्रैल को मरीज को ब्रेन डेड घोषित किया तो उसके बाद मरीज के सभी टेस्ट कराए गए। डाॅ. कुंदन मित्तल ने बताया कि मरीज के टेस्ट तुरंत प्रभाव से करने पर डाॅ. अर्पणा परमार, डाॅ. राजेश रोहिल्ला, डाॅ सीमा, डाॅ. रोहित, डाॅ. पंकज छिक्कारा, डाॅ. सुखबीर, दिप्ती, राजेश, रोहित, हरेंद्र का बहुत अहम योगदान रहा।

अंगदान सिर्फ एक चिकित्सा प्रक्रिया नहीं

सोटो के नोडल अधिकारी डाॅ. सुखबीर सिंह ने कहा कि अंगदान सिर्फ एक चिकित्सा प्रक्रिया नहीं है, यह एक इंसान का दूसरे इंसान के प्रति सबसे बड़ा प्रेम और बलिदान है। जब एक व्यक्ति ब्रेन डेड होता है, तो उसके स्वस्थ अंग कई लोगों की जान बचा सकते हैं। डाॅ. सुखबीर सिंह और दीप्ति खरब ने बताया कि कैसे एक अंगदाता 8 से अधिक लोगों को नया जीवन दे सकता है और दर्जनों लोगों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार कर सकता है।

हम हमेशा 24 घंटे पीजीआई के साथ खड़े हैं: SP गौरव राज पुरोहित

रोहतक पुलिस के कप्तान गौरव राज पुरोहित ने कहा कि हम इस नेक कार्य के लिए हमेशा पीजीआई के साथ 24 घंटे कंधे से कंधा मिलाकर कार्य करने के लिए खडे हुए हैं। उन्होंने कहा कि आधी रात को जैसे ही अंगदान का रूट कंफर्म हुआ पूरे शहर में सुबह 6 बजे से 7: 45 तक दो बार ग्रीन कोरिडोर बनाकर अंग 100 की स्पीड से दूसरे अस्पतालों में पहुचाए गए। रोहतक पुलिस के कप्तान गौरव राज पुरोहित ने कहा कि वें अपनी टीम में शामिल 100 से अधिक पुलिस कर्मचारियों, एडिशनल एसपी आयुष यादव, 2 ट्रैफिक  एसएचओ जसबीर, प्रवीण सहित 4 ज्यूडिशियरी एसएचओ समेत सभी पुलिस कर्मचारियों को बधाई देते हैं जिन्होंने जैसे ही अंग दिल्ली के लिए निकले पूरे शहर के रास्ते को ब्लाॅक करके पूरी स्पीड से अंग रोहतक से दिल्ली के लिए निकलवाने में अहम भूमिका अदा करवाई।

एक अंत में नई जिंदगियों की शुरुआत

बेहोशी विभाग के प्रो. डाॅ. तरूण ने बताया कि हमारे अस्पताल के आईसीयू और ऑपरेशन थिएटर ने ना जाने कितनी मौतें देखी हैं, लेकिन आज का दिन बहुत अलग है। आज एक जिंदगी का अंत जरूर हुआ है, लेकिन उसी अंत से कई नई जिंदगियों की शुरुआत भी हुई है। डाॅ. तरुण ने कहा कि यह मृत्यु पर जीवन की विजय है। जब हमें परिवार की सहमति मिली, तो हमारी पूरी टीम बिना एक पल गंवाए इस महायज्ञ में जुट गई। मेडिकल स्टाफ के लिए भी यह बेहद भावुक पल था। ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर दीप्ति और रोहित ने बताया कि जब उस वीर सिपाही को ऑपरेशन थिएटर ले जाया जा रहा था, तो हर डॉक्टर और नर्स का सिर उनके सम्मान में झुका हुआ था।

हरियाणा में जग रही अलख,  दूर हो रही हैं भ्रांतियां

  • कुलपति डाॅ.एच.के. अग्रवाल ने कहा कि यह अंगदान की सफलता सिर्फ एक दिन की प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि इसके पीछे स्टेट ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन (सोटो) की सालों की कड़ी मेहनत है। एक समय था जब हरियाणा और उत्तर भारत में अंगदान को लेकर लोगों के मन में खौफ और भ्रांतियों का पहाड़ था।
  • सोटो ने हरियाणा में अंगदान को लेकर अलख जगाने का कार्य किया है, जिसके लिए डाॅ. सुखबीर सिंह, दिप्ती खरब, राजेश भड बधाई के पात्र हैं। पहले लोग अंगदान के नाम से ही डरते थे क्योंकि लोगों के मन में अंगदान के प्रति तरह तरह के भ्रम थे। इन तमाम अंधविश्वासों और भ्रांतियों के कारण भारत में लाखों लोग हर साल ऑर्गन के इंतजार में दम तोड़ देते थे।
  • लेकिन सोटो हरियाणा से दिप्ती जाखड और राजेश कुमार ने घर-घर जाकर, सेमिनार करके और एनजीओ के माध्यमों से विभिन्न कार्यक्रमोें में काउंसलिंग के जरिए इस अज्ञानता के अंधेरे को चीरा है। अब लोग खुद आगे आकर अंगदान के बारे में पता कर रहे हैं। डाॅ. अग्रवाल ने कहा कि जो समाज कल तक इस विषय पर बात करने से भी कतराता था, आज वहां के लोग अपने प्रियजनों को खोने के असहनीय दर्द के बीच भी सोटो के समन्वयकों से खुद कहते हैं कि क्या हम इसके अंग दान कर सकते हैं? इस वीर सिपाही के परिवार का फैसला भी सोटो द्वारा जगाई गई इसी अलख का परिणाम है।

जब पत्थरों का सीना भी पसीज गया: सिपाही को आखिरी सलामी

  • अंगदान की प्रक्रिया पूरी होने के बाद जब सिपाही का पार्थिव शरीर अस्पताल से बाहर लाया गया, तो वह मंजर ऐसा था जिसे देखकर पत्थर दिल इंसान के भी आंसू छलक आएं। वहां मौजूद कोई भी ऐसा शख्स नहीं था जिसकी आंखें नम न हों।
  • पार्थिव शरीर को तिरंगे झंडे में लपेटा गया। इस वीर सपूत को अंतिम विदाई देने के लिए पूरे शहर के गणमान्य व्यक्तियों, हरियाणा पुलिस और सुनारियां जेल, पीजीआईएमएस के गार्ड्स ने पूरे सैन्य सम्मान के साथ सलामी दी। लोगों ने वंदेमातरम  और भारत माता के जयकारे लगाकर सिपाही को श्रृद्वांजलि अर्पित की।
  • पुलिस के अधिकारी, जो अक्सर सख्त मिजाज माने जाते हैं, वे भी अपने इस युवा साथी के शहादत पर रो पड़े। पत्नी अपने पति के शव को सल्युट करके सलामी दी।
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