मुंबई: दुबई में रहने वाले एक परिवार के पास पुणे में एक फ्लैट है। पिता के रिटायरमेंट से पहले खरीदा गया यह घर पिछले तीन साल से बंद पड़ा है। सोसाइटी का मेंटेनेंस हर महीने कटता है, प्रॉपर्टी टैक्स का नोटिस साल में एक बार आता है, और चाबी किसी रिश्तेदार के पास है जो छह महीने में एक बार जाकर देख आता है कि सीलन तो नहीं लगी। यह कहानी अकेली नहीं है। अमेरिका, ब्रिटेन, सिंगापुर, दुबई और ऑस्ट्रेलिया में बसे लाखों भारतीय परिवारों के पास देश में कोई न कोई संपत्ति है, जिसे अब तक किसी परिचित या स्थानीय दलाल के भरोसे चलाया जाता रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में यह ढांचा बदल रहा है। परिवार अब इस काम के लिए पेशेवर NRI प्रॉपर्टी मैनेजमेंट कंपनियों की ओर रुख कर रहे हैं, जो किराएदार ढूंढ़ने से लेकर मरम्मत, कागज़ी काम और टैक्स तक हर हिस्सा संभालती हैं।
दिक्कत सिर्फ किराया नहीं है
जब घर विदेश से चलाया जाता है, तो असली परेशानी किराए की रकम नहीं, भरोसे की कमी होती है। मरम्मत हुई या नहीं, यह कैसे पता चले जब आप खुद वहां नहीं जा सकते? सोसाइटी का नोटिस, टैक्स की रसीद, बिजली-पानी का बिल, यह कागज़ कहां रखा जाए जब मालिक हज़ारों किलोमीटर दूर बैठा हो? और किराएदार पैसा देना बंद कर दे तो विदेश बैठकर यह लड़ाई कौन लड़े?
यही वह जगह है जहां संगठित प्रॉपर्टी मैनेजमेंट कंपनियां काम करती हैं। एक वेतनभोगी मैनेजर संपत्ति का पूरा प्रभार लेता है, हर काम को बिल की एक अलग लाइन में दर्ज करता है, और मरम्मत से पहले-बाद की तारीख़ वाली तस्वीरें भेजता है ताकि मालिक को सबूत मिले, अनुमान नहीं। किराएदार का पैसा सीधे मालिक के खाते में जाता है, कंपनी अपनी फ़ीस अलग से और साफ़-साफ़ लेती है।
छह शहरों में फैला एक मॉडल
मुंबई की एक कंपनी 66mgroad.com इसी मॉडल पर मुंबई, पुणे, बेंगलुरु, हैदराबाद, चेन्नई और गुड़गांव में काम करती है, और सिंगापुर व दुबई में बसे मालिकों के लिए स्थानीय संपर्क केंद्र भी चलाती है। हर संपत्ति को एक तय मैनेजर सौंपा जाता है, न कि किसी कॉल सेंटर को। किराया वसूली, निरीक्षण, चाबी की हिरासत, वेंडर से मरम्मत, सोसाइटी व नगर निगम का टैक्स, बिजली-पानी के बिल, यह सब एक ही मासिक रिपोर्ट में मालिक के सामने आता है। किराए पर कोई कमीशन नहीं, मरम्मत असल लागत पर बिल होती है, रसीद के साथ।
काम किराया वसूलने तक सीमित नहीं है। किराएदार ढूंढ़ना और जांचना, संस्थागत किराएदारों तक पहुंच, किराया समझौता व ज़रूरी रजिस्ट्रेशन, किराएदार विवाद या बेदखली में सहयोग, यह सब इसी सेवा में शामिल है। साथ में टीडीएस वापसी का प्रमाणपत्र, पावर ऑफ अटॉर्नी, विरासत के कागज़ात जैसे टैक्स और क़ानूनी सवाल भी वकीलों और चार्टर्ड अकाउंटेंट्स के वेटेड नेटवर्क के ज़रिए सुलझाए जाते हैं।
कंपनी के संस्थापक सौरभ गर्ग कहते हैं कि विदेश बैठे मालिक की सबसे बड़ी शिकायत पैसा नहीं, पारदर्शिता की कमी होती है। जब हर खर्च की तारीख़ वाली तस्वीर और रसीद मिलती है, तो भरोसा अपने आप बनता है, चाहे मालिक हज़ारों किलोमीटर दूर ही क्यों न बैठा हो।
खाली घर और बिल्डर की साख
जिन मालिकों की संपत्ति फ़िलहाल खाली है, उनके लिए ताला लगा घर किसी के कब्ज़े का न्योता बन सकता है, इसलिए नियमित निगरानी और दस्तावेज़ी रिकॉर्ड रखा जाता है। साथ ही, नई संपत्ति खरीदने की सोच रहे परिवारों के लिए बिल्डर और सोसाइटी की साख जांचना मुश्किल होता है जब वे खुद जाकर पता नहीं कर सकते। इसी ज़रूरत के लिए बिल्डरों और सोसाइटियों की एक रेटिंग इंडेक्स भी तैयार की गई है, जिसमें हर रेटिंग किसी वास्तविक मालिक या निवासी से आती है और छपने से पहले दस्तावेज़ से जांची जाती है।
शुरू करने से पहले परिवार क्या तैयार रखे
किसी भी सेवा से बात करने से पहले परिवार के पास तीन चीज़ें तैयार होनी चाहिए। पहला, संपत्ति के मूल कागज़ात — सेल डीड, पुराना किराया समझौता, टैक्स रिकॉर्ड। दूसरा, यह साफ़ जानकारी कि घर किराए पर है, खाली है, या किसी रिश्तेदार के पास चाबी है। तीसरा, भारत में एक बैंक खाता जिसमें किराया आ सके, आमतौर पर NRO खाता। यह भी पूछना ज़रूरी है कि कंपनी किराए पर कमीशन लेती है या तय फ़ीस, क्योंकि यही फ़र्क़ तय करता है कि मैनेजर मालिक की तरफ़ से काम कर रहा है या अपनी तरफ़ से।
विदेश में बसे परिवार के लिए भारत में रखी संपत्ति अब सिर्फ निवेश नहीं, एक ऐसी ज़िम्मेदारी बन गई है जिसे सही सिस्टम के बिना संभालना मुश्किल होता जा रहा है। अधिक जानकारी 66mgroad.com पर उपलब्ध है।


