मुंबई: हर परिवार में एक व्यक्ति ऐसा होता है जिसकी कहानी सब जानते हैं, पर लिखी किसी ने नहीं। वह दादा जो 1947 में सरहद पार से एक ट्रंक लेकर आया था। वह पिता जो चौबीस साल की उम्र में रोहतक से निकलकर मुंबई में पहला काम ढूंढ़ता रहा। वह मां जिसने उधार की सिलाई मशीन से घर चलाया। यह कहानी बैठक में सुनाई जाती है, शादियों में दोहराई जाती है, और एक दिन बुज़ुर्ग के साथ ही चली जाती है।
पिछले कुछ वर्षों में भारतीय परिवारों में इस कमी को लेकर सजगता बढ़ी है। परिवार अब पेशेवर लेखकों को नियुक्त कर अपने बुज़ुर्गों की जीवनी लिखवा रहे हैं। कहीं यह पिता के अस्सीवें जन्मदिन के लिए होता है, कहीं कारोबार की पहली पीढ़ी का रिकॉर्ड रखने के लिए, तो कहीं इसलिए कि घर के बुज़ुर्ग की याददाश्त कमज़ोर पड़ने लगी है और परिवार के पास समय कम है।
### यह काम कहलाता क्या है
अंग्रेज़ी में इसे घोस्टराइटिंग कहा जाता है। लेखक इंटरव्यू करता है, शोध करता है और पूरी किताब लिखता है, लेकिन किताब पर नाम उसी व्यक्ति का रहता है जिसकी कहानी है। लेखक पर्दे के पीछे रहता है। यह चलन नया नहीं है। दुनिया भर में राजनेताओं, खिलाड़ियों और उद्योगपतियों की बहुत सी आत्मकथाएं इसी तरह लिखी गई हैं। भारत में अब यही सुविधा आम परिवारों तक पहुंच रही है।
काम की शुरुआत रिकॉर्डर से होती है। एक पूरी किताब के लिए लेखक विषय-व्यक्ति के साथ तीस से साठ घंटे बैठता है, और उतनी ही बातचीत परिवार, साझेदारों, पुराने सहयोगियों और उन लोगों से करता है जो उस समय मौजूद थे। इसके बाद शोध का हिस्सा आता है — पुराने पत्र, कंपनी के रिकॉर्ड, अदालत के कागज़, पुराने अख़बार, और अक्सर वह कस्बा जहां परिवार दशकों पहले रहता था। स्मृति के भरोसे लिखने के बजाय हर तारीख़ और हर नाम की जांच दस्तावेज़ से की जाती है।
इसके बाद अध्यायों की योजना बनती है, जिस पर परिवार की सहमति ली जाती है, और फिर साठ से नब्बे हज़ार शब्दों की पांडुलिपि तैयार होती है। ड्राफ्ट पर आमतौर पर तीन दौर के संशोधन होते हैं। पूरी प्रक्रिया में लगभग एक साल लगता है।
### प्रवासी परिवारों में मांग सबसे ज़्यादा
इस काम की सबसे तेज़ मांग विदेश में बसे भारतीय परिवारों से आ रही है। अमेरिका, ब्रिटेन, दुबई, सिंगापुर, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में बसे बच्चों के पास पिता की कहानी सुनने का समय हर साल घटता जाता है, और अगली पीढ़ी अक्सर हिंदी या पंजाबी पढ़ नहीं पाती। ऐसे में किताब उस पुल का काम करती है जो बातचीत नहीं कर पा रही। कई परिवार इसे जन्मदिन, सालगिरह या पिता की सेवानिवृत्ति पर दिए जाने वाले उपहार के रूप में तैयार करवाते हैं।
### समय और खर्च
इस क्षेत्र में कीमत को लेकर पारदर्शिता कम रही है और अधिकतर सेवाएं फ़ीस सार्वजनिक नहीं करतीं। मुंबई में रहने वाले और हरियाणा में पले-बढ़े लेखक सौरभ गर्ग ने अपनी फ़ीस खुले तौर पर प्रकाशित की है। एक अधिकृत जीवनी, संस्मरण या पारिवारिक इतिहास की किताब के लिए वह पच्चीस लाख रुपये लेते हैं, जिसमें सभी इंटरव्यू, शोध, पूरी पांडुलिपि और तीन दौर के संशोधन शामिल हैं। वह एक समय में एक ही किताब पर काम करते हैं और हर पन्ना खुद लिखते हैं। उनका [जीवनी लेखन](https://sgwashere.com/) का काम और पूरी फ़ीस सूची उनकी वेबसाइट पर देखी जा सकती है।
गर्ग एक प्रकाशित उपन्यास के लेखक हैं और ‘फाउंडर थीसिस’ पॉडकास्ट के सह-मेज़बान रहे हैं, जिसमें उद्यमियों के लंबे इंटरव्यू रिकॉर्ड किए जाते हैं। उनका कहना है कि जीवनी का असली काम लिखना नहीं, सुनना है, और यही वह हिस्सा है जिसे जल्दबाज़ी में तैयार की गई किताबें छोड़ देती हैं।
### शुरू करने से पहले परिवार क्या तैयार रखे
लेखक से बात करने से पहले परिवार तीन चीज़ें जुटा ले तो काम काफ़ी आसान हो जाता है। पहला, तारीख़ें — जन्म, गांव छोड़ने का साल, पहली नौकरी, पहला कारोबार, शादी। दूसरा, कागज़ और तस्वीरें — पुराने पत्र, स्कूल के प्रमाणपत्र, ज़मीन के कागज़, एल्बम। तीसरा, उन लोगों की सूची जिनसे बात होनी चाहिए, क्योंकि उनमें से कई अस्सी पार कर चुके होते हैं।
और एक बात, जो इस काम से जुड़े लोग बार-बार दोहराते हैं। किताब लिखवाने का सही समय वह नहीं होता जब परिवार तैयार हो जाए। वह होता है जब बुज़ुर्ग अभी बोल पा रहा हो। अधिक जानकारी [sgwashere.com] पर उपलब्ध है।


