Monday, May 11, 2026
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पीजीआईएमएस में ‘डबल कुर्सी’ का खेल, अफसर भी एचओडी भी

गरिमा टाइम्स न्यूज.रोहतक

प्रदेश के सबसे बड़े मेडिकल संस्थानों में शामिल पीजीआईएमएस रोहतक इन दिनों इलाज या रिसर्च से ज्यादा ‘कुर्सियों के खेल’ को लेकर चर्चा में है। हालात ऐसे हैं कि यहां नेशनल मेडिकल काउंसिल (एनएमसी) के नियमों को खुलेआम नजरअंदाज किया जा रहा है। प्रशासनिक पदों पर बैठे बड़े अधिकारी अपने-अपने विभागों के अध्यक्ष यानी एचओडी की कुर्सियां भी संभाले हुए हैं। सवाल सिर्फ नियम टूटने का नहीं, बल्कि उन डॉक्टरों के भविष्य का भी है जो वर्षों से प्रमोशन का इंतजार कर रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इस पूरे मामले की शिकायतें भी हो चुकी हैं, लेकिन व्यवस्था पर कोई असर दिखाई नहीं दे रहा।

दरअसल एनएमसी और यूनिवर्सिटी नियम साफ कहते हैं कि डायरेक्टर, डीन और मेडिकल सुपरिंटेंडेंट जैसे प्रशासनिक पदों पर बैठा व्यक्ति अपने विभाग का एचओडी नहीं रह सकता। वजह भी साफ है, दोनों जिम्मेदारियां अलग-अलग हैं और दोनों पदों पर निष्पक्ष काम जरूरी माना गया है। लेकिन पीजीआईएमएस में तस्वीर बिल्कुल उलटी नजर आ रही है।
मौजूदा स्थिति देखें तो पीजीआईएमएस के डायरेक्टर डॉ. सुरेश सिंघल एनिस्थिसिया विभाग के एचओडी भी बने हुए हैं। डॉ. अशोक चौहान डीन होने के साथ रेडियोलॉजी विभाग के अध्यक्ष भी हैं। इसी तरह हेल्थ यूनिवर्सिटी के डीन डॉ. एमजी वशिष्ठ सर्जरी विभाग की कमान भी संभाले हुए हैं। मामला यहीं नहीं रुकता। डॉ. कुंदन मित्तल मेडिकल सुपरिंटेंडेंट यानी एमएस होने के बावजूद पीडियाट्रिक विभाग के एचओडी भी बने हुए हैं।

दिलचस्प बात यह है कि डॉ. कुंदन मित्तल को सीओई परचेज भी बनाया गया, हालांकि बाद में आपत्ति उठने पर कागजात वापस लेने पड़े। लेकिन इससे यह सवाल और गहरा गया कि आखिर नियमों की अनदेखी किस स्तर तक हो रही है।

उम्र सीमा भी दरकिनार

मामले में एक और बड़ा पेंच मेडिकल सुपरिंटेंडेंट की नियुक्ति को लेकर भी है। वर्ष 2008 के यूनिवर्सिटी नियमों के अनुसार एमएस पद के लिए डॉक्टर की उम्र कम से कम 40 और अधिकतम 58 वर्ष होनी चाहिए। यानी 58 साल से ज्यादा उम्र का डॉक्टर इस कुर्सी पर नहीं बैठ सकता।

पहले कुर्सी छोड़ना परंपरा थी, अब पकड़कर बैठने की होड़

पीजीआईएमएस के पुराने रिकॉर्ड देखें तो पहले हालात अलग थे। जब किसी डॉक्टर को प्रशासनिक जिम्मेदारी मिलती थी तो वह विभागाध्यक्ष की कुर्सी छोड़ देता था। यही वजह थी कि संस्थान में प्रमोशन और जिम्मेदारियों का संतुलन बना रहता था। पूर्व डायरेक्टर डॉ. चांद सिंह ढुल जब नेत्र रोग विभाग से डायरेक्टर बने थे तो उन्होंने एचओडी पद छोड़ दिया था और उनकी जगह डॉक्टर एके खुराना को जिम्मेदारी दी गई। इसी तरह डॉ. आरसी सिवाच ने मेडिकल सुपरिंटेंडेंट बनने के बाद हड्डी रोग विभाग की कमान छोड़ दी थी और डॉ. एनके मग्घु का एचओडी बनाया गया। पूर्व डायरेक्टर डॉ. रोहताश यादव और और पूर्व डायरेक्टर डॉ. एसएस लोहचब के मामलों में भी यही प्रक्रिया अपनाई गई थी। यानी पहले नियमों को व्यवस्था माना जाता था, लेकिन अब कुर्सी छोड़ने की परंपरा लगभग खत्म होती दिखाई दे रही है।

अंदरखाने बढ़ रही नाराजगी

संस्थान के भीतर कई वरिष्ठ डॉक्टर इस व्यवस्था से नाराज हैं। उनका कहना है कि एक ही व्यक्ति के पास दो-दो बड़े पद रहने से प्रमोशन और नेतृत्व के अवसर सीमित हो रहे हैं। कई विभागों में वरिष्ठ डॉक्टर वर्षों से एचओडी बनने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, लेकिन कुर्सियां खाली ही नहीं हो रहीं। दूसरी ओर सवाल यह भी उठ रहा है कि जब नियम साफ हैं तो फिर उन्हें लागू क्यों नहीं किया जा रहा। क्या बड़े पदों पर बैठे अधिकारियों के लिए अलग नियम हैं और बाकी डॉक्टरों के लिए अलग।

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