गरिमा टाइम्स न्यूज.रोहतक
पीजीआईएमएस रोहतक में बच्चों के लिए प्रस्तावित 160 करोड़ रुपए का “पीड्स एक्सीलेंट सेंटर” अब इलाज से ज्यादा इगो की लड़ाई का केंद्र बनता नजर आ रहा है। ईसी बैठक में रखे गए इस प्रोजेक्ट ने संस्थान के भीतर खींचतान को खुलकर सामने ला दिया है। एक तरफ रिटायरमेंट से पहले उपलब्धि जोड़ने की जल्दबाजी है, तो दूसरी तरफ पहले से मौजूद विभागों के डॉक्टर अपने-अपने प्रस्तावों के साथ अड़ गए हैं। नतीजा मामला उलझ गया है और अब फैसला कमेटी के पाले में चला गया है।
रिटायरमेंट से पहले बड़ा दांव, लेकिन अधूरा खाका
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, चिकित्सा अधीक्षक डॉ. कुंदन मित्तल ने 5 मई की ईसी बैठक में 160 करोड़ का यह प्रपोजल रखा, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतने बड़े प्रोजेक्ट की बुनियादी जानकारी ही गायब है। सेंटर बनेगा कहां, डॉक्टर कितने होंगे, स्टाफ कैसे आएगा, इन सवालों का जवाब फाइल में नहीं है। ऐसे में इसे विजन कम और जल्दबाजी ज्यादा माना जा रहा है।
तीन-तीन दावे, कौन बनेगा असली हकदार
पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजी के लिए न्यूरोलॉजी विभाग की एचओडी डॉ. सुरेखा डाबला पहले ही प्रस्ताव दे चुकी हैं, जबकि पीडियाट्रिक कार्डियोलॉजी के लिए डॉ. अश्वनी का अलग प्लान है। अब डॉ. मित्तल का एक्सीलेंट सेंटर इन दोनों को समेटने की बात कर रहा है। सवाल उठ रहा है कि एक ही संस्थान में एक ही बीमारी के कितने ‘अलग-अलग ठिकाने’ बनेंगे।
कमेटी के भरोसे फैसला, अब ठंडे बस्ते में प्रोजेक्ट
विवाद बढ़ता देख ईसी ने तुरंत एक कमेटी गठित कर दी है। इसमें डीन एमजी वशिष्ठ, फाइनेंस एडवाइजर और एस्टेट ऑफिसर दुष्यंत शामिल हैं। यह टीम तय करेगी कि नया सेंटर वाकई जरूरी है या मौजूदा विभागों में ही बच्चों के लिए विशेष यूनिट बनाकर काम चल सकता है। जब तक रिपोर्ट नहीं आती, प्रोजेक्ट पर ब्रेक लग गया है।
डॉक्टरों की कमी, फिर भी नया ढांचा, कैसे चलेगा सिस्टम
पीजीआई पहले ही स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की कमी से जूझ रहा है। ऐसे में नया सेंटर बनने का मतलब है नए डॉक्टर, नई टीम और अलग संसाधन। सवाल यह है कि जब मौजूदा विभाग ही पूरी क्षमता से नहीं चल पा रहे, तो एक और सुपर स्पेशियलिटी सेंटर कैसे संभाला जाएगा।
160 करोड़ का बोझ, सरकार पर बढ़ेगा दबाव
नया सेंटर बनता है तो करीब 160 करोड़ रुपये का सीधा खर्च सरकार पर आएगा। इसके अलावा स्टाफ, उपकरण और रखरखाव का अलग बोझ होगा। जबकि विशेषज्ञ मानते हैं कि मौजूदा न्यूरोलॉजी और कार्डियोलॉजी विभागों में ही बच्चों के लिए अलग यूनिट बनाकर कम खर्च में बेहतर सुविधा दी जा सकती है।
इलाज से ज्यादा प्रतिष्ठा की जंग, मरीज कहां जाएं
पूरे विवाद में सबसे बड़ा सवाल मरीजों को लेकर है। डॉक्टरों की इस खींचतान के बीच बच्चों के इलाज की असली जरूरत कहीं पीछे छूटती दिख रही है। अगर विभाग बंटे तो मरीजों को भी अलग-अलग जगह भटकना पड़ेगा, जिससे इलाज और जटिल हो सकता है।

