Tuesday, May 12, 2026
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खौफ के साए में मासूमों का सफर : स्कूल टाइम में ‘खतरे का कॉरिडोर’ बना सुखपुरा रोड

  • ओवरलोड ऑटो, टूटी सड़क और बेलगाम ट्रैफिक के बीच हर रोज दांव पर बच्चों की जिंदगी
  • स्कूल पहुंचने से पहले ही बच्चों को पार करनी पड़ रही खतरनाक सड़क परीक्षा

गरिमा टाइम्स न्यूज.रोहतक

सुबह का वक्त। पीठ पर भारी स्कूल बैग टांगे छोटे-छोटे बच्चे। सड़क किनारे धूल उड़ाती तेज रफ्तार गाड़ियां और उनके बीच एक ऑटो, जिसमें क्षमता से कई गुना ज्यादा बच्चों को ठूंसकर बैठाया गया है। सुखपुरा चौक से बस स्टैंड तक का रास्ता इन दिनों स्कूली बच्चों के लिए किसी जोखिम भरे सफर से कम नहीं रह गया। यहां हर सुबह और दोपहर सड़क पर ऐसा मंजर दिखाई देता है, जिसे देखकर अभिभावकों की धड़कन बढ़ना लाजिमी है।

इस मार्ग पर ट्रैफिक दबाव लगातार बढ़ रहा है, लेकिन सुरक्षा इंतजाम लगभग नदारद हैं। जगह-जगह टूटी सड़क, गहरे गड्ढे, उड़ती धूल और अव्यवस्थित यातायात ने हालात को और खतरनाक बना दिया है। सबसे ज्यादा चिंता उन स्कूली बच्चों को लेकर है, जो रोज इसी रास्ते से गुजरते हैं।

ऑटो चालकों की लापरवाही भी अब खुलकर सामने आने लगी है। एक छोटे ऑटो में 10 से 12 बच्चों को बैठाना यहां आम बात बन चुकी है।सड़क पर हल्का सा झटका या अचानक ब्रेक भी बड़े हादसे की वजह बन सकता है।
स्थिति तब और भयावह हो जाती है, जब स्कूल टाइम में तेज रफ्तार बाइक और कारें बच्चों के बेहद करीब से गुजरती हैं। सड़क पार करने के दौरान कई बार बच्चों को दौड़ लगानी पड़ती है। आसपास कोई ऐसा प्रबंध भी नहीं दिखता, जो वाहन चालकों को गति कम करने के लिए मजबूर करे।

स्कूल रूट या हादसों का रास्ता

सुखपुरा चौक से बस स्टैंड तक का यह मार्ग लंबे समय से बदहाल पड़ा है। सड़क की परत कई जगह उखड़ चुकी है। गड्ढों और धूल के कारण वाहन चालक अचानक दिशा बदलते हैं, जिससे पीछे चल रहे बच्चों और ऑटो पर खतरा और बढ़ जाता है। ओमप्रकाश, राजेंद्र, बिमल आदि का कहना है कि कई बार छोटे हादसे हो चुके हैं, लेकिन स्थायी समाधान की दिशा में कोई गंभीर पहल नहीं हुई।

नियम सिर्फ बोर्डों तक सीमित

इस मार्ग पर ट्रैफिक नियमों की अनदेखी खुलेआम दिखाई देती है। कई ऑटो बिना फिटनेस और बिना निर्धारित मानकों के सड़कों पर दौड़ रहे हैं। कुछ चालकों के पास वैध दस्तावेज तक नहीं होते, लेकिन जांच का अभाव उन्हें बेखौफ बनाए हुए है। स्कूल टाइम में भी वाहन तेज रफ्तार से गुजरते हैं, जबकि संवेदनशील क्षेत्रों में गति नियंत्रण सबसे जरूरी माना जाता है।

अभिभावकों की चिंता

कई अभिभावकों का कहना है कि वे बच्चों की सुरक्षा को लेकर लगातार चिंतित रहते हैं, लेकिन मजबूरी में यही साधन चुनना पड़ता है। निजी वाहन हर परिवार के बस की बात नहीं है और सुरक्षित स्कूल परिवहन की सुविधा भी सीमित है। ऐसे में माता-पिता रोज डर के साये में बच्चों को स्कूल भेजने को मजबूर हैं।

स्कूलों की जिम्मेदारी पर भी उठ रहे सवाल

सड़क सुरक्षा को लेकर अब स्कूल प्रबंधन की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं। कई स्कूलों के बाहर न तो ट्रैफिक को व्यवस्थित करने की व्यवस्था दिखाई देती है और न ही बच्चों को सुरक्षित सड़क पार कराने के लिए कर्मचारी तैनात रहते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ प्रशासन ही नहीं, बल्कि स्कूलों को भी बच्चों के सुरक्षित आवागमन के लिए जिम्मेदारी तय करनी होगी। हादसे के बाद नहीं, पहले जागना होगा। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते व्यवस्था नहीं सुधरी, तो कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है। जरूरत इस बात की है कि स्कूल टाइम में ट्रैफिक पुलिस की विशेष तैनाती हो, ओवरलोड ऑटो पर कार्रवाई की जाए और सड़क को तुरंत दुरुस्त किया जाए। बच्चों की सुरक्षा किसी भी शहर की प्राथमिक जिम्मेदारी होती है, लेकिन यहां हालात देखकर सवाल उठ रहा है कि क्या सिस्टम किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार कर रहा है।

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