Friday, October 16, 2026
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बेटे की टांग न कटे इसलिए मां ने जीते जी अपने पांव की हड्डी कटवाई

आकाश हेल्थकेयर में शुरू मांओं की हड्डियों से चलने वाले बच्चों की दास्तान

आकाश हेल्थकेयर में शुरू मांओं की हड्डियों से चलने वाले बच्चों की दास्तान

नई दिल्लीः हड्डी क्या चीज है, 5 साल के बेटे समीर के इलाज के लिए उजबेकिस्तान से दिल्ली आई नरगिस उसके लिए जान भी दे देती। कैंसर ने उसके एक पांव की हड्डी को गला दिया था। वह चल पाए, उसके पांव न काटने पड़े इसलिए उसने जीते जी अपने पांव की हड्डी काट कर दे दी। बड़ी बात यह है कि आकाश हेल्थकेयर ने ही मांओं की हड्डियों से बच्चों को पांव देने की नई खोज की है। हड्डी के ग्रैफ्टिंग ( प्रत्यारोपण ) के लिए अब तक हुई सभी बच्चों की सर्जरी सफल रही है। अभी तक हाथों में ही हड्डी की ऐसी ग्रफ्टिंग का ही प्रमाण मिलता है। अगर आकाश हेल्थकेयर ने इस नई खोज को अंजाम नहीं दिया होता तो इन सारे बच्चों के पांव काटने पड़ते और वे सब दिन के लिए ह्वीलचेयर के गुलाम हो जाते या उन्हें कृत्रिम पांव लगाने पड़ते।

समीर को अब ह्वील चेयर की जरुरत नही पड़ेगी, मां ने अपनी हड्डी देकर उसे पांव जो दे दिया है। बहुत जल्द वह चलने, उछलने कूदने  लगेगा। नर्गिस ने कहा – समीर के लिए जान भी हाजिर है, हड्डी क्या चीज है। मां के पांव की हड्डी भी पहले जैसी हो जाएगी। कई कारणों से पांवों की हड्डियां गल जाती हैं। इनफेक्शन ( संक्रमण) से भी हड्डियां गल जाती हैं। अब तक हाथों व कमर के ऊपरी हिस्सों में ही हड्डी का ट्रांसप्लांट होता था। पांवों में हड्डी के ट्रांसप्लांट जिसे ग्राफ्टिंग कहते हैं, की कोई मिशाल मेडिकल साहित्य में नही मिलती है। इसलिए आकाश हेल्थकेयर को इस मामले में अग्रणी होने का खिताब दे दें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए।

16 साल की बिहार की कशिश की लंबे समय के (क्रोनिक) संक्रमण की वजह से जांघ की हड्डी गल गई थी। 5 साल पहले उसे ऐसी ग्रैफ्टिंग की गई थी। उसे भी मां ने ही हड्डी दी थी। इसे फिबुला ग्रैफ्ट कहते हैं। वह अब सामान्य रूप से चल रही है। 2021 से कशिश की सर्जरी के साथ ही आकाश हेल्थकेयर में यह विधा शुरु हुई। आकाश अस्पताल के एमडी एवं हड्डी व घुटने के ट्रांसप्लांट के जाने माने विशेषज्ञ डा. आशीष चौधरी, सर्जिकल ओंकोलांजी के निदेशक डा. अरुण कुमार गिरी एवं हड्डी विभाग के कंसलटेंट डा. अभिषेक कुमार संभरिया की टीम ने उजबेकिस्तान के समीर की सर्जरी की। इस अस्पताल में उजबेकिस्तान एवं तजकिस्तान के 4 और बच्चों की ऐसी ही सफल सर्जरी हो चुकी है।

डा. आशीष चौधरी कहते हैं- ‘जब पहली मां अपनी हड्डी देने के तैयार हुई थी तो पांवों में हड्डी ग्रैफ्टिंग की कोई मिसाल नहीं थी। अबतक ऐसी ग्रैफ्टिंग हाथों में हुई थी । हमने सोचना शुरु किया कि वैसी ग्रैफ्टिंग पांवों में क्यों नहीं हो सकती। अंततः हमने इस दिशा में आगे बढ़ने का तय किया। 5 साल बाद अब हम दावे से कह सकते हैं कि ऐसी ग्रैफ्टिंग पांवों में भी संभव है। मां की हड्डी होती है इसलिए मैचिंग की कोई समस्या नहीं होती’

हड्डी की ग्रैफ्टिंग बोन बैंक की हड्डियों से भी होती है लेकिन ऐसे मामलों में वैसा करने का समय नहीं रहता। फिर देश में सिर्फ अहमदाबाद में एक बोन बैंक है। बोन बैंक से हड्डी लेने पर मैचिंग एक बहुत बड़ी समस्या सामने आती है

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