Farmers News : चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार द्वारा विकसित उन्नत किस्मों के गुणवत्तापूर्ण बीजों की मांग लगातार बढ़ रही है। किसानों तक विश्वविद्यालय की नवीन कृषि तकनीकों एवं उच्च गुणवत्ता वाले बीजों की पहुंच सुनिश्चित करने की दिशा में विश्वविद्यालय निजी क्षेत्र की कंपनियों के साथ निरंतर सहयोग बढ़ा रहा है।
इसी कड़ी में विश्वविद्यालय द्वारा विकसित सरसों की पहली हाइब्रिड आरएचएच 2101 के बीजों के उत्पादन एवं वितरण को बढ़ावा देने के लिए शक्ति वर्धक हाइब्रिड सीड्स प्राइवेट लिमिटेड, हिसार के साथ समझौता किया गया है।
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बलदेव राज काम्बोज ने बताया कि विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल उन्नत कृषि तकनीकों और बेहतर किस्मों के बीजों का विकास करना ही नहीं, बल्कि अनुसंधान के परिणामों को किसानों तक पहुंचाकर कृषि उत्पादन एवं उनकी आय में वृद्धि सुनिश्चित करना भी है। उन्होंने कहा कि निजी क्षेत्र की कंपनियों के साथ किए जा रहे समझौते इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। इनसे विश्वविद्यालय द्वारा विकसित उन्नत किस्मों के गुणवत्तापूर्ण बीजों का बड़े स्तर पर उत्पादन एवं वितरण संभव हो सकेगा। साथ ही, वैज्ञानिक अनुसंधान का लाभ सीधे किसानों तक पहुंचेगा, कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा और हरियाणा कृषि नवाचार के क्षेत्र में नई उपलब्धियां हासिल करेगा।
कुलपति की उपस्थिति में हुआ समझौता
समझौते पर कुलपति प्रो. बलदेव राज काम्बोज की उपस्थिति में शक्ति वर्धक हाइब्रिड सीड्स प्राइवेट लिमिटेड की ओर से कंपनी के आर एंड डी डिवीजन के प्रमुख डॉ. राज बहादुर तथा विश्वविद्यालय की ओर से अनुसंधान निदेशक डॉ. राजबीर गर्ग ने हस्ताक्षर किए।
जानें- आरएचएच 2101 की खासियत
अनुसंधान निदेशक डॉ. राजबीर गर्ग ने बताया कि आरएचएच 2101 विश्वविद्यालय द्वारा विकसित पहली हाइब्रिड किस्म है। यह लगभग 142 दिन में पककर तैयार हो जाती है तथा इसकी उपज क्षमता 28 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक है। इस किस्म में शाखाओं की संख्या अधिक होती है और प्रति फली दानों की संख्या भी अपेक्षाकृत अधिक होती है, जिससे इसकी उत्पादन क्षमता बेहतर होती है। इसके दाने मध्यम आकार के होते हैं तथा इनमें लगभग 40 प्रतिशत तेल अंश पाया जाता है।
इस प्रकार के समझौतों से विश्वविद्यालय की उन्नत किस्मों के बीजों का व्यापक स्तर पर उत्पादन और किसानों तक उनकी उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिलेगी। इससे कृषि अनुसंधान और व्यावहारिक खेती के बीच बेहतर तालमेल स्थापित होगा तथा किसानों को नवीन कृषि तकनीकों एवं उन्नत बीजों का लाभ मिल सकेगा।

